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थार की प्यास बुझाने नाडियों में लौट रहा जीवन… मूलसागर व चूंधी की नाडियों का पुनर्जीवन

थार मरुस्थलीय क्षेत्र में जल संरक्षण और जल सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में राजस्थान पत्रिका के अमृतम जलम अभियान, एसबीआइ फाउंडेशन तथा उरमूल ट्रस्ट के संयुक्त प्रयासों से संचालित ग्राम सक्षम परियोजना ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जल संबल बनती दिखाई दे रही है।

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थार मरुस्थलीय क्षेत्र में जल संरक्षण और जल सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में राजस्थान पत्रिका के अमृतम जलम अभियान, एसबीआइ फाउंडेशन तथा उरमूल ट्रस्ट के संयुक्त प्रयासों से संचालित ग्राम सक्षम परियोजना ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जल संबल बनती दिखाई दे रही है। परियोजना के अंतर्गत मूलसागर और चूंधी गांवों की सार्वजनिक नाड़ियों का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। जल संरक्षण कार्यक्रम के तहत क्षेत्र में जल असमानता कम करने और वर्षाजल के बेहतर संग्रहण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

नाडी विकास कार्यों में नाडियों का गहरीकरण, पाल को मजबूत बनाने और कैचमेंट क्षेत्र में उगी अवांछित झाड़ियों को मशीनों से हटाने का कार्य किया जा रहा है। इन प्रयासों से आगामी वर्षा ऋतु में जल संग्रहण क्षमता बढ़ने के साथ ग्रामीणों और पशुधन के लिए वर्षभर जल उपलब्धता सुनिश्चित होने की संभावना है। थार क्षेत्र में पारंपरिक नाड़ियां लंबे समय से ग्रामीण जीवन की आधारशिला रही हैं। मरुस्थलीय इलाकों में इनका महत्व केवल जल स्रोत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन और सामाजिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। ऐसे में इनका पुनर्जीवन जल संकट से राहत दिलाने के साथ स्थायी जल प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

... ताकि सशक्त हो सके ग्रामीण जीवन

फाउंडेशन के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्वपन धर ने कहा कि ग्रामीण समुदायों के समग्र विकास के लिए जल संरक्षण महत्वपूर्ण आधार है। जैसलमेर जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र में जल उपलब्धता बढ़ाने के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रेरणा प्रशिक्षण केंद्रों और ग्राम सेवा केंद्रों जैसी पहल ग्रामीण जीवन को सशक्त बना रही हैं। उरमूल ट्रस्ट के सचिव रमेश सारण ने बताया कि थार क्षेत्र के दूर-दराज गांवों में जल संग्रहण, संरक्षण और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सामुदायिक स्तर पर पारंपरिक जल संसाधनों के संरक्षण और वर्षाजल संचयन की स्थायी व्यवस्था विकसित की जा रही है। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है, जिससे लोग अपने संसाधनों के संरक्षण और रखरखाव के प्रति जिम्मेदारी भी महसूस कर सकें। उन्होंने उम्मीद जताई कि मानसून के बाद इस परियोजना के सकारात्मक परिणाम धरातल पर स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे।