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जैसलमेर

नियमों के मकडज़ाल में फंसे स्वर्णनगरी के मूल बाशिंदों की गुहार सुनिए मंत्रीजी!

साढ़े आठ सौ साल से ज्यादा प्राचीन जैसलमेर शहर में कई पीढिय़ों से अपने घरों में निवास कर रहे मूल बाशिंदों को उनके घरों का मालिकाना हक नहीं मिल पाया है और यह सब सोनार दुर्ग की 300 मीटर की परिधि में लागू किए गए केंद्रीय पुरातत्व एवं संरक्षण विभाग के उन नियमों के कारण हुआ है, जिनमें समयानुकूल बदलाव नहीं किया जा सका है।

जैसलमेरJun 16, 2024 / 08:29 pm

Deepak Vyas

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साढ़े आठ सौ साल से ज्यादा प्राचीन जैसलमेर शहर में कई पीढिय़ों से अपने घरों में निवास कर रहे मूल बाशिंदों को उनके घरों का मालिकाना हक नहीं मिल पाया है और यह सब सोनार दुर्ग की 300 मीटर की परिधि में लागू किए गए केंद्रीय पुरातत्व एवं संरक्षण विभाग के उन नियमों के कारण हुआ है, जिनमें समयानुकूल बदलाव नहीं किया जा सका है। दुर्ग की 100 मीटर की परिधि में नए निर्माणों आदि पर रोक का असर तो कहीं नजर नहीं आता और धड़ल्ले से ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं खड़ी की जा रही हैं लेकिन 300 मीटर तक लागू पुरातत्व विभाग के नियमों की वजह से स्टेट ग्रांट एक्ट के तहत दिए जाने वाले घरों के पट्टे जारी करने में अवश्य रोक लग गई है। पुरातत्व विभाग केंद्रीय कला-संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आता है, यह मंत्रालय जोधपुर सांसद गजेंद्रसिंह शेखावत को सौंपे जाने के बाद जैसलमेर के बाशिंदों को एक उम्मीद की किरण अवश्य नजर आई है।

व्यर्थ साबित हुआ अभियान

राजस्थान की पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने साल 2021 में ही प्रशासन शहरों के संग अभियान को लॉन्च कर दिया था। इस अभियान का संचालन विधानसभा चुनाव और उसके बाद मार्च तक किया गया। इतनी बड़ी अवधि में नगरपरिषद ने हजारों की तादाद में कच्ची बस्तियों से लेकर अन्य इलाकों में पट्टों का वितरण किया गया। जानकारी के अनुसार सोनार दुर्ग की 300 मीटर की परिधि में पुरातत्व विभाग के नियमों की बदौलत उच्च न्यायालय से इस जद में आने वाले गली-मोहल्लों के रियासतकालीन घरों के नियमन व पट्टा जारी करने पर रोक लग गई, जो बदस्तूर कायम है।

हजारों घरों को नहीं मिला लाभ

सोनार दुर्ग और उससे लगते 300 मीटर क्षेत्र में स्टेट ग्रांट के तहत पट्टे जारी करने पर रोक लगाए जाने का असर हजारों लोगों पर प्रत्यक्ष तौर पर पड़ा है। 500 से ज्यादा घरों की बसावट तो खुद दुर्ग पर ही है। उनेक अलावा कम से कम 1500 मकानों के पट्टे लेने के दावेदार नाउम्मीद हो गए। यह इलाका रियासतकालीन शहर का लगभग आधा भूभाग है। गौरतलब है कि जब 2021 में प्रशासन शहरों के संग अभियान का आगाज किया गया तो बहुत बड़ी तादाद में रियासतकालीन शहर के निवासी आवेदन करने पहुंचे। जबउन्हें पट्टे जारी करने पर ही रोक लग गई तो वे निराश हो गए।

कायदे से नहीं की गई पैरवी

  • जानकारों की मानें तो सोनार दुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्र में रहने वाले बाशिंदे पिछले कई दशकों से पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग के नियमों के मकडज़ाल में फंसते रहे हैं। न्यायालय में भी मामले पहुंचे है। इस संबंध में स्थानीय निकाय के स्तर से एकमात्र रिहायशी दुर्ग की पैरवी ढंग से नहीं की गई। जिसके कारण सोनार दुर्ग और आसपास रहने वाले हजारों घरों की आबादी अपने ही मकानों के मालिकाना हक से आज तक वंचित बनी हुई है।
  • जानकारों का यह भी मानना है कि जैसलमेर दुर्ग तथा उसके 100 व 300 मीटर की परिधि के क्षेत्र के लिए पुरातत्व विभाग के नियमों में समायानुकूल तब्दीली की जानी जरूरी है। देश की आजादी के बाद बनाए गए पुरातत्व विभाग के नियम कई दशक पुराने हो चुके हैं। उनमें बदलते समय के साथ मौजूदा वक्त के तकाजों व आम रहवासियों के हित में बदलाव लाया जाना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए संसद में कानून बनाया जाना चाहिए।
  • पुरातत्व विभाग के नियमों की वजह से पुराने शहर के बाशिंदों को बेजा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका समाधान खोजा जाना चाहिए। ये नियम-कायदे पुराने पड़ चुके हैं।

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