scriptno pre-preparation is done to save rain water in jaisalmer | रेगिस्तान में बरसा 'अमृत' तो 'निगल' जाएगा आसमान, पढ़ें पूरी खबर | Patrika News

रेगिस्तान में बरसा 'अमृत' तो 'निगल' जाएगा आसमान, पढ़ें पूरी खबर

जैसलमेर में जमा होने वाले बरसाती पानी के उपयोग को लेकर कोई पूर्व तैयारी नहीं होने से इस बार भी स्थिति यह बन गई है कि यदि प्री मानसून की स्थिति को देखते हुए आगामी दिनों में बेहतर बारिश हुई तो करोड़ों लीटर पानी वाष्प बनकर उड़ जाएगा।

जैसलमेर

Published: June 27, 2022 03:04:50 pm

दीपक व्यास

जैसलमेर. जिले के अलग-अलग रण क्षेत्रों में जमा होने वाले बरसाती पानी के उपयोग को लेकर कोई पूर्व तैयारी नहीं होने से इस बार भी स्थिति यह बन गई है कि यदि प्री मानसून की स्थिति को देखते हुए आगामी दिनों में बेहतर बारिश हुई तो करोड़ों लीटर पानी वाष्प बनकर उड़ जाएगा। गौरतलब है कि पाक सीमा से सटा रेगिस्तानी जिला जैसलमेर में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। पानी को यहां अमृत के सामान समझा जाता है। दूरस्थ गांवों में आज भी पो फटने के साथ ही ग्रामीण पीने के लिए पानी की जुगत में जुट जाते हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2006 में अतिवृष्टि के कारण वर्षों बाद जिले के खड़ीनों में बड़ी मात्रा में पानी एकत्रित हुआ था। बड़ी मात्रा में जमा पानी का कोई उपयोग नहीं हुआ। जानकारों के अनुसार खाभा, ब्रह्मसर, पोहड़ा, काणोद, हड्डा, लाणेला व रूपसी के रण क्षेत्रों में जल संग्रहण की अद्भुत क्षमता है। विशाल भौगोलिक क्षेत्र में फैले इस रण के पानी का सदुपयोग कर लंबे समय तक उपयोग किया जा सकता है।
no pre-preparation is done to save rain water in jaisalmer
वर्ष 2006 में समझा महत्व, लेकिन कवायद शून्य
सरहदी जिले में वर्ष 2006 में अतिवृष्टि के कारण बाढ़ के हालात बन गए थे, इस दौरान वर्षों बाद जिले के खड़ीनों में बड़ी मात्रा में पानी भी जमा हो गया था। निराशाजनक बात यह रही कि इस पानी का कोई उपयोग ही नहीं हो पाया। वर्ष 2006-07 में तत्कालीन जिला कलक्टर डॉ. केके पाठक की पहल से रण क्षेत्रों में बारिश के पानी को रोककर उसकी खेती या पीने के पानी में उपयोग करने की योजना तैयार की गई। मौजूदा समय में हकीकत यह है कि जिले के रण क्षेत्रों में अभी भी बरसाती पानी को संरक्षित रखने की कवायद देखने को नहीं मिल रही है। जानकार बताते हैं कि खाभा, ब्रह्मसर, पोहड़ा, काणोद, हड्डा, लाणेला व रूपसी के रण क्षेत्रों में जल संग्रहण की अद्भुत क्षमता है।
प्री मानसून ने जगाई उम्मीद
वैसे तो पाक सीमा से सटा सरहदी जिला बारिश के लिहाज से दुर्भाग्यशाली माना जाता है। यहां वर्ष की औसत बारिश का आंकड़ा केवल 165 एमएम ही है। इस बार प्री मानूसन पर धोरों की धरती पर मेघ मेहरबान दिख रहे हैं, ऐसे में जानकारों की मानें तो मानसून में सरहदी जिले में बेहतर बारिश होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

बरसाती पानी का यह हो सकता है उपयोग
खाभा व रूपसी जैसे अन्य मीठे पानी की प्रकृति वाले रणों में बरसाती पानी को रोककर खारे पानी में मिलने से रोकने और खड़ीनों को छोटे भागों में बांटकर और पम्पिंग के जरिए किसानों को कृषि कार्यों में लाभान्वित किया जा सकता है। खारे पानी में मिलने से पहले ही मीठे पानी के रण को छोटे खड़ीनों में बांटकर लंबे समय तक कृषि कार्यों में वहां जमा पानी का उपयोग हो सकता है। बरसाती पानी की आवक के कारण रण के पानी के प्रवाह को एनीकट से रोककर योग्य भूमि को खेती के लायक बनाकर उपयोग में भी लिया ज सकता है।

ऐसे है रण: कोई मीठे तो कोई खारे
खाभा व रुपसी के रण मीठे हैं। रण मीठे होने का कारण यह भी है कि यहां स्थित मिट्टी में खारापन कम है। इसके अलावा पानी का भू-सतह के नीचे अवशोषण भी होता है। काणोद व हड्डा के रण खारे हैं। खारे रण में भूमि के रिसाव कम होने से पानी का ठहराव अधिक होता है। वाष्पीकरण के कारण खारापन अधिक रहता है। जैसलमेर जिले में 40 से 50 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले रण प्राचीन समय में प्रवाहित होने वाली नदी के विलुप्त होने से बने हैं। नदी में पानी नहीं आने से यहां बचा अवशेष पानी सूर्य की गर्मी के कारण भाप बनकर उड़ गया। बार-बार पानी के उडऩे के कारण पानी में स्थित तत्व खनिज लवण के रूप में जमते रहे। यही कारण है कि ये रण स्वाद में खारे हैं।
पालीवाल समाज ने विकसित की बरसाती जल संरक्षण की तकनीक
पालीवाल समुदाय के लोगों ने बरसाती जल का पानी खड़ीन के रूप में खेती के लिए ही नहीं, बल्कि पीने के पानी के लिए तालाबों, नाडियों में संग्रहण कर जल संरक्षण पर बल दिया। पालीवाल समुदाय के लोगों ने बरसाती जल के संग्रहण के तरीकों को नए-नए रूप में इजाद किया। जब बरसाती पानी को तालाब, नाडी, खड़ीन के रूप में एकत्रित किया तो उसके रिसाव क्षेत्र में भी छोटी-छोटी कुइयां, बेरियां, बावडिय़ों का निर्माण कराया, जिससे अधिक से अधिक पानी को सुरक्षित रखा जा सके। उन्होंने बरसाती पानी के संरक्षण के लिए कई तरीके अपनाए, जिनमें खड़ीन, तालाब, नाडियां, बावडिय़ां आदि तो थे ही। इसके अलावा भी इन्होने अधिक से अधिक पानी का उपयोग लेने का भी प्रयास किया।
-ऋषिदत्त पालीवाल, इतिहासवेत्ता, जैसलमेर

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