'वक्त की मांग बन गया है प्लाज्मा-दान'

-जैसलमेर के कई लोगों को बाहरी शहरों में पड़ती है जरूरत
-संभाग स्तर पर ही प्लाज्मा लेने की सुविधा

By: Deepak Vyas

Published: 22 Nov 2020, 06:36 PM IST

जैसलमेर. विश्वव्यापी कोरोना महामारी के उपचार में प्लाज्मा थेरेपी उम्मीद की एक किरण बन कर सामने आई है। राजस्थान में इस थेरेपी से चिकित्सकों ने कोविड.19 से ग्रस्त डेढ़ हजार से अधिक लोगों की जान बचाई है। ऐसे में अब जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में भी प्लाज्मा दान करने के प्रति लोगों में जज्बा जगाने की जरूरत नजर आने लगी है। हालांकि प्लाज्मा थेरेपी की व्यवस्था जैसलमेर में नहीं है और यह केवल राज्य के संभागीय मुख्यालय स्थित अस्पतालों में ही संभव है। इसके बावजूद जैसलमेर के कई कोविड.19 संक्रमित रोगी जोधपुरए बीकानेरए अहमदाबाद आदि शहरों में उपचार करवा रहे हैं। उन्हें वहां जब प्लाज्मा थेरेपी की जरूरत पड़ती है तब उनके लिए प्लाज्मा की व्यवस्था करना बहुत मुश्किल कार्य हो जाता है। यदि जैसलमेर के लोग इस कार्य में रक्तदान की भांति आगे आने लगें तो यह मरीजों के लिए बहुत हितकारी होगा।
आती है दिक्कत
जैसलमेर के कई संक्रमितों को जोधपुर आदि शहरों में उपचार के दौरान प्लाज्मा की आवश्यकता बुरी तरह से महसूस की गई और बहुत मुश्किल से प्लाज्मा दान करने वाला व्यक्ति मिल पाया है। ऐसे में जैसलमेर के स्थानीय लोग अगर आगे आएं तो बात बन सकती है। जैसलमेर जिले में पिछले महीनों के दौरान करीब 1300 जने संक्रमित होने के बाद स्वस्थ हो चुके हैं। एबी पॉजिटिव रोगी को इसके लिए ज्यादा परेशानी पेश आती है क्योंकि उन्हें इसी रक्त समूह के प्लाज्मा डोनर की जरूरत रहती है।
क्या है प्लाज्मा थेरेपी
-कोरोना वायरस के उपचार में बहुत अधिक प्रभावी मानी जा रही प्लाज्मा थेरेपी को लेकर चिकित्सा के क्षेत्र में उत्साह का माहौल बना।
-चिकित्सकीय विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कोरोना के उपचार में काम आने वाली वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक इस थेरेपी से कोरोना संक्रमण का इलाज किया जा सकता है।
-प्लाज्मा थेरेपी एक असरकारी तरीका हैए जो कई तरह के रोगों से मुक्ति दिलाने में लाभकारी है। यह एक बड़ी वजह है कि इस थेरेपी के जरिए कोरोना संक्रमितों को फिर से ठीक करने की और रिकवरी में तेजी लाने की उम्मीद लगातार बनी हुई है।
-इसके जरिए किसी रोगी का उपचार करने के लिए उस व्यक्ति के शरीर से ऐंटिबॉडीज निकाली जाती है, जो पहले इस बीमारी से संक्रमित रहा हो और बाद में ठीक हो गया हो।
-इस स्थिति में ठीक हुए व्यक्ति के शरीर में वायरस को मारनेवाली ऐंटिबॉडीज विकसित हो जाती है। किसी अन्य रोगी की चिकित्सा के दौरान स्वस्थ हो चुके व्यक्ति के शरीर से इन ऐंटिबॉडीज को निकालकर रोगी के शरीर में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। जिससे उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को जल्दी से मजबूत बनाया जा सके।

Deepak Vyas Bureau Incharge
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