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सा'ब! महोत्सव मरु प्रदेश का है, अधिकारियों का नहीं.....

सा'ब! महोत्सव मरु प्रदेश का है, अधिकारियों का नहीं.....

 

जैसलमेर

Published: February 18, 2022 06:44:58 pm

जैसलमेर . जिसका भय था, वहीं हुआ। जैसलमेर में यूं तो वर्ष १९७९ से लेकर अब तक लगातार मरु महोत्सव आयोजित किया जा रहा है, लेकिन यदि विश्व स्तर पर आयोजित होने वाले इस महोत्सव की आभा कम हुई है, तो इसकी वजह ाी जि मेदारों को ही ढूंढऩे की जरूरत है। धूम-धड़ाके के कार्यक्रमों से तो भीड़ जुटा ली गई, लेकिन दिन में लोक संस्कृति के कार्यक्रमों के आयोजनों के बीच भीड़ का उखडऩा चिंता बढ़ाने का ही विषय है। मरु महोत्सव के आयोजन और इसमें पर्यटन महकमे व पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों की भागीदारी का कारण भी यही है कि देश-दुनिया में जैसलमेर को पहचान मिले और यहां पर्यटन व्यवसाय में बढ़ोतरी हो। मंथन का विषय यह है कि क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है। हकीकत यह है कि अव्यवस्थाओं के बीच आयोजन में सैलानी व स्थानीय लोगों का मोहभंग हो रहा है। हालांकि शाम को धूम धड़ाके के कार्यक्रम में भीड़ जुटा ली गई, लेकिन सोचने का विषय यह है कि ऐसे आयोजनों से मरु प्रदेश के पर्यटन को क्या मिला या फिर क्या मिलेगा? विगत वर्षों में एक और बात सामने आई है कि आयोजन से महज पांच-सात दिन पहले ही शासन-प्रशासन हाथ-पांव संभालता है और फिर बनी बनाई लीक पर तीन दिन तक आयोजन को संपन्न करवा देता है। वैसे, इस बार महोत्सव चार दिन का रहा। पहला सवाल तो यही है कि जब जग वि यात मरु-महोत्सव की तारीखें माघ मास की त्रयोदशी से प्रारंभ और पूर्णिमा तक समापन की पहले से तय होती है तो इसका प्रचार कुछ माह पूर्व से क्यों नहीं किया जा सकता? दिवाली और नववर्ष के समय जैसलमेर में हजारों की तादाद में आए सैलानियों को अगर इसकी जानकारी मिलती तो वे अपने गृह क्षेत्र में जाकर अन्य लोगों को इसके बारे में बता सकते थे। यही एक बड़ा कारण भी है कि मरु महोत्सव के समय उतनी बड़ी सं या में सैलानी नहीं जुटते, जितने यहां दिवाली या नए साल के सीजन में आते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि मरु महोत्सव के दौरान सरकारी तौर-तरीके इस कदर हावी रहते हैं कि, इसमें शामिल होने वाले सैलानियों व स्थानीय लोगों को कई बार बदसलूकी का सामना करना पड़ता है। इस बार भी स्थिति जुदा नहीं रही। स्थानीय लोगों ने अपना दर्द सोशल मीडिया पर बयां किया। उनकी पीड़ा लाजमी है कि मेजबान शहर के बाशिंदों को अपमानित किया जाए, वहीं अधिकारियों व उनके परिचितों की आवग ागत पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाए। सबसे बड़ा अपमान उस समय महसूस किया जाता है जब चलते कार्यक्रम में बैठे हुए सैलानियों या स्थानीय लोगों को यह कहकर उठा दिया जाता है कि यह स्थान उनके लिए नहीं है। ऐसे में अधिकारियों और उनके परिवारजनों को वीआईपी होने का अहसास करवाया जाता है तथा सैलानी व अन्य आमजन खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं।
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