Jaisalmer- पूर्वजों ने जिसे मेहनत से बनाया, वह अब उपेक्षा से उजाड रहे

By: jitendra changani

Updated: 18 Nov 2017, 10:52 PM IST

Jaisalmer, Rajasthan, India

Rajasthan patrika

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नहीं हो रहा है परंपरागत पेयजल स्रोतों का रख रखाव मारवाड़ क्षेत्र के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है। यहां लोग पशुपालन कर उनसे होने वाली आय से अपना जीवनयापन करते हैं। यहां लोगों को अपने जीवन के अलावा पशुओं के जीवन को बचाने के लिए भी चारे पानी को बचाकर व सहेज कर रखना जरूरी होता है। क्षेत्र में पानी की कमी व आए दिन पडऩे वाले अकाल से निपटने के लिए ग्रामीणों की ओर से अपने गांवों में बेहतर जल प्रबंधन व अपने एवं अपने पशुओं की आवश्यकता के लिए मीठे पानी के कुएं खोदकर व तालाब बनाकर उनका रख रखाव किया जाता था। इन कुओं व तालाबों का गांव के परंपरागत पेयजल स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता था, लेकिन बदलते परिवेश, बढ़ती जनसंख्या, जलदाय विभाग की ओर से पाइपलाइन व जीएलआरों का निर्माण कर गांव में की गई पेयजल व्यवस्था के कारण लोगों का लगाव ऐसे परंपरागत पेयजल स्रोतों के प्रति कम होने लगा है। जिसके चलते तालाब में रेत जमा हो रही है, उनके घाट व पाल क्षतिग्रस्त हो रहे हैं तथा कुएं भी देखरेख के अभाव में क्षतिग्रस्त होकर अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। जिन्हें बचाने के लिए न तो ग्रामीणों, न ग्राम पंचायत व प्रशासन की ओर से कोई प्रयास किए जा रहे हैं।


पोकरण . क्षेत्र के कई गांवों में सैंकड़ों वर्ष पूर्व निर्माण करवाए परंपरागत पेयजल स्रोत उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। उनकी उपेक्षा के साथ ही खत्म हो रहा है यहां का इतिहास, कला एवं संस्कृति। ऐसा ही एक परंपरागत पेयजल स्रोत झलारिया ग्राम पंचायत के हनुमानपुरा में स्थित है। जिसका ग्रामीणों की ओर से वर्षों पूर्व निर्माण करवाया गया था। हनुमानबेरा के नाम से विख्यात यह कुआं कभी झलारिया ग्राम पंचायत क्षेत्र के कई गांवों की प्यास बुझाता था, लेकिन आज ग्रामीणों, ग्राम पंचायत व प्रशासन की उपेक्षा के चलते धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा है।

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