scriptThe era of change in politics has started | राजनीति के करवट बदलने का दौर शुरू | Patrika News

राजनीति के करवट बदलने का दौर शुरू

- कांग्रेस में नए समीकरणों की आहट
- भाजपा में नए चेहरे की उठने लगी मांग

जैसलमेर

Updated: May 15, 2022 07:32:12 pm

जैसलमेर. राज्य विधानसभा के बीच अब लगभग डेढ़ साल का समय बचा है। ऐसे में जिले के मौजूदा विधायक जहां वापसी का अरमान लिए काम में जुटे हैं तो दूसरी तरफ विपक्षी भाजपा के नेता पार्टी की टिकट के लिए समीकरण बिठाने की जुगत कर रहे हैं। इस सबके बीच सीमांत जैसलमेर जिले की राजनीति भी करवट बदलती दिखने लगी है। हालांकि अभी इसका शुरुआती दौर है। आने वाले समय में चीजें और ज्यादा साफ हो जाएंगी। जैसलमेर क्षेत्र से आरक्षित वर्ग के रूपाराम धनदे ने गत चुनाव में सामान्य सीट से करीब तीस हजार की विशाल अंतर वाली जीत हासिल कर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था तो पोकरण से शाले मोहम्मद ने हिंदू-मुस्लिम कार्ड को भौथरा करते हुए महंत प्रतापपुरी को नजदीकी मुकाबले में हरा कर राजस्थान ही नहीं देशभर में हलचल पैदा कर दी। जिसका इनाम उन्हें केबिनेट मंत्री के तौर पर दिया गया। लेकिन राजनीति में सफलताओं को दोहराना पड़ता है वरना वे एक घटना भर के तौर पर ही याद रह जाती है। यही कारण है कि सत्ताधारी दल के दोनों विधायक एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने के बावजूद आगामी चुनाव में फिर से जीत कर विधानसभा में प्रवेश करने को आतुर हैं। दूसरी ओर भाजपा में अंदरखाने टिकट की लड़ाई चल रही है। इसके नेता यह मानकर चल रहे हैं कि अगले साल के आखिर में होने वाले चुनाव में सत्ता परिवर्तन की रवायत बनी रहेगी और पार्टी का टिकट जिसके नाम कट गया वही विधानसभा तक पहुंच जाएगा। जिले में विधानसभा चुनाव का टिकट मिलने के बीच अभी बहुत से पड़ावों वाली यात्रा है। जिसमें जैसलमेर से पूर्व विधायक द्वय छोटूसिंह भाटी और सांगसिंह भाटी के अलावा विक्रमसिंह नाचना, छुगसिंह सोढ़ा और कुछ युवा नेता स्वयं को दौड़ में मान कर चल रहे हैं। पोकरण से प्रतापपुरी महाराज लगातार सक्रियता दिखाकर टिकट को अपना हक मान रहे हंै तो पूर्व विधायक शैतानसिंह राठौड़ इस बार विधायकी का अरमान किसी भी हालत में छोडऩे को तैयार नहीं हैं। पार्टी में जैसलमेर क्षेत्र में नए चेहरे को आजमाने की मांग भी भीतरखाने उठने लगी है। जहां तक कांग्रेस में टिकटों का सवाल है, पोकरण में शाले मोहम्मद के सामने कोई चुनौती नहीं है। जैसलमेर में रूपाराम धनदे तो हालांकि अपनी टिकट कन्फर्म मानकर चल रहे हैं लेकिन टिकटों में उठापटक का पार्टी का पुराना रिकॉर्ड रहा है। यहां पार्टी की उम्मीदवारी पिछले पांच-छह विधानसभा चुनावों में ऐनवक्त पर ही तय हुई है। ऐसे में यकीन से कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
समीकरणों में बदलाव
समीकरणों में बदलाव की आहट कांग्रेस और भाजपा दोनों में अब शनै: शनै: दिखने लगी है। गत दिनों पड़ोसी जिले के कद्दावर कांग्रेसी नेता के जन्मदिन पर शहरभर में लगे हॉर्डिंग्स से विधायक और उनके परिवारजनों के फोटो लगभग गायब रहे। जबकि यह पूर्व मंत्री स्थानीय विधायक के राजनीतिक मार्गदर्शक माने जाते रहे हैं। उनकी कुछ दिन पहले की जैसलमेर यात्रा के समय भी यह दूरी कांग्रेसजनों ने लक्षित की। ऐसे ही भाजपा में केंद्र की केबिनेट में शामिल मंत्री की अपनी पसंद की राजनीति भी चल रही है। जिसमें पोकरण के पूर्व विधायक उनके खासमखास गिने जाते हैं। जैसलमेर में भी उनकी पसंद आम चर्चाओं से अलग नेता है। दोनों पार्टियों की राजनीति को करीब से जानने वाले बताते हैं कि समीकरणों का बदलाव समय के साथ और साफ होता जाएगा।
विधायक रुठों को मनाने में जुटे
जैसलमेर विधायक रूपाराम धनदे पिछले कुछ अर्से से सार्वजनिक तौर पर सक्रिय हुए हैं। वे लम्बे समय तक फील्ड से दूर रहे। जिसका कारण वे कोरोना तथा अपने स्वास्थ्य को बताते हैं। लोगों से मिलते हुए अब वे भरोसा दिला रहे हैं कि लगातार क्षेत्र में रहेंगे तथा आमजन से सीधा जुड़ाव रखेंगे। उन्हें जैसलमेर शहर को लेकर खूब आशंकाएं सता रही हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से भाजपा प्रत्याशी पर शहर में चार हजार से ज्यादा मतों से बढ़त हासिल की थी जबकि शहर को हमेशा से भाजपा का गढ़ माना जाता है। शहर में इस बार छीजत की आशंका के चलते विधायक रुठे हुए या अब तक अनमने दिख रहे कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोडऩे की रणनीति पर काम शुरू कर चुके हैं। यह जानकारी भी मिली है कि, इस काम में उन्होंने अपने कई विश्वस्तों को भी लगा दिया है। वे फकीर खेमे में शामिल कांग्रेसजनों से संवाद का प्रयास कर रहे हैं। उनकी चाहत यही नजर आती है कि चुनाव में कम से कम पार्टी के लोग उनसे शत्रुता नहीं निभाएं। वहीं पोकरण विधायक और मंत्री शाले मोहम्मद क्षेत्र में सक्रिय तो शुरू से रहे हैं, पिता गाजी फकीर के इंतकाल के बाद सिंधी मुस्लिमों का चीफ खलीफा बनने के बाद कौम से अपना जुड़ाव निरंतर प्रगाढ़ करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। जाहिर है, इसमें उन्हें राजनीतिक लाभ की भी पूरी उम्मीद है और ऐसा करते हुए वे समुदाय के वोटों पर पकड़ को मजबूत करना चाहते हैं।
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