दूसरों के घर होंगे रोशन, तो इनके घर भी मनेगी दिवाली

- कुम्हार समाज को नहीं मिल पाती है पर्याप्त मजदूरी
- सरकार नहीं कर रही है प्रोत्साहित

By: Deepak Vyas

Published: 13 Nov 2020, 09:00 PM IST


पोकरण. दीपावली पर प्रत्येक घर रोशन होता है मिट्टी के दीपक से, लेकिन इन मिट्टी के दीपक बनाने वालों की दीपावली कैसी होती है, किस प्रकार दीपक बनाकर अपनी रोजी रोटी चलाते है, कोई व्यक्ति इस तरफ नहीं देखता। गौरतलब है कि लाल मिट्टी से कुंभकार अपनी हस्तकला के माध्यम से दीपक बनाता है और दीपावली के मौके पर बाजार में बेचता है। धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दीपक जलाना शुभ होता है। इसी लिए दीपावली पर इन मिट्टी के दीपक की जमकर बिक्री होती है। दीपक बनाने वाले कुम्हार समाज के लोगों पर पेश है ग्राउण्ड रिपोर्ट...!
बच्चे भी बनाते है दीपक
घर के बड़े लोग खिलौने व अन्य आईटम बनाते है, तो छोटे बालक बालिकाएं भी अपने माता-पिता का हाथ बंटाते हुए उनकी मदद करते है। छोटे बड़े दीपक व बच्चों के आईटम बनाने में इन कुंभ कलाकारों के बालक बालिकाएं भी पीछे नहीं है। दीपावली के त्यौहार पर आने वाले मिट्टी के छोटे दीपक अधिकतर बालक बालिकाएं ही बनाते है। दीपक बनाने के बाद दो दिन तक उन्हें सुखाया जाता है तथा दो दिन बाद उसे आग में पकाकर बेचने के लिए तैयार किया जाता है। मिट्टी के दीपक पोकरण कस्बे के अलावा उपखंड के ग्रामीण क्षेत्र, जैसलमेर-बाड़मेर व जोधपुर जिले के कई गांवों में बिकने के लिए जाता है। जिससे दीपावली के दौरान ठीक-ठाक आमदनी हो जाती है।
दीये हजारों, पर तेल नहीं
कुम्हार समाज के लोगों की हालत इस कदर है कि दीये तो हजारों है, लेकिन उनमें तेल नहीं है। मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुंभकार हस्तकला समिति के अध्यक्ष मदनलाल प्रजापत, सत्यनारायण प्रजापत सहित अन्य लोगों ने बताया कि उनके हाथों से बनाए दीपक से औरों के घर जगमगा उठते है, लेकिन उन्हें आज भी इसकी पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलने के कारण उनके घर की रोशनी आज भी फीकी है। उनका कहना है कि जितनी लागत व मेहनत मिट्टी के दीपक बनाने में लगती है, उसका पर्याप्त मूल्य नहीं मिल पाता है। जिससे अब दीपक बनाना ज्यादा नफे का कार्य नहीं है। उन्होंने बताया कि एक दीपक बनाने में एक से डेढ़ रुपए तक लागत आती है। कुम्हार समाज के कई लोग दीपक बनाने में लगे हुए है। घर का मुखिया मिट्टी खोदकर लाता है और बच्चे व औरतेंं उसे कूटकर महीन, चिकनी व दीपक बनाने लायक बनाते है। उसके बाद चाक पर दीपक तैयार करते है। इस तरह जब पूरा परिवार मेहनत करता है, तो मुश्किल से प्रति दीपक उसे 50 पैसे मुनाफा मिल पाता है। उनका मानना है कि यदि सरकार इस हस्तकला को संरक्षित व प्रोत्साहित करने के लिए कार्य करे तथा मिट्टी के दीपक व खिलौने बनाने पर कुंभ हस्तकलाकारों को उसके टेराकोट उत्पाद पर कुछ सहायता व अनुदान राशि की व्यवस्था करें, तो यह कला लम्बे समय तक चल सकती है। अन्यथा आने वाले युग में बढ़ती महंगाई व खर्च को देखते हुए लोगों का इस कार्य से मोहभंग होगा तथा लोगों को मिट्टी के दीपक की जगह कोई अन्य विकल्प ढूंढऩा पड़ेगा।
मशीनों से काम हुआ है कुछ आसान
कुम्हार समाज के लोगों ने बताया कि गत जून माह में अल्पसंख्यक मामलात, वक्फ एवं जन अभियोग निराकरण विभाग मंत्री शाले मोहम्मद व जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष अमीनखां के प्रयासों से खादी और ग्रामोद्योग आयोग की ओर से स्थानीय कुम्हार समाज के लोगों को चाक की 80 मशीनें व मिट्टी को गोंदने के लिए आठ मशीनें उपलब्ध करवाई गई थी। इन मशीनों से समाज के लोगों को खासी राहत मिली है तथा मिट्टी के दीपक सहित अन्य खिलौने व सामान बनाने में आसानी हुई है।

Deepak Vyas Bureau Incharge
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