scriptThe message of cleanliness will come from across the Himalayas | हिमालय के उस पार से आकर देंगे स्वच्छता का संदेश! | Patrika News

हिमालय के उस पार से आकर देंगे स्वच्छता का संदेश!

- अब शुरू होगी गिद्धों की आवक, शीतकाल में करते है प्रवास

जैसलमेर

Published: October 21, 2021 09:10:15 pm


पोकरण. वर्ष 2014 में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निर्वाचित हुए, तो उन्होंने देशभर में स्वच्छता अभियान शुरू किया गया। ऐसे ही कुछ प्रवासी पश्चिमी राजस्थान में शीतकाल के दौरान प्रवास करते है तथा स्वच्छता का संदेश देते है। हिमालय के उस पार से आने वाले दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों की आवक अब कुछ ही दिनों में शुरू होने वाली है। मध्य एशिया, यूरोप, तिब्बत आदि शीत प्रदेशों से पश्चिमी राजस्थान की तरफ आने वाले दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों का वन्यजीवप्रेमी भी इंतजार कर रहे है। गुलाबी ठंड की शुरुआत के साथ अब उनके आने की आहट भी शुरू हो चुकी है। गिद्धों की आवक को देखते हुए वन विभाग ने भी तैयारी शुरू करते हुए गश्त बढ़ा दी है। गौरतलब है कि प्रतिवर्ष अक्टूबर माह के दूसरे पखवाड़े से नवम्बर माह की शुरुआत में दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों का पहला जत्था यहां पहुंचता है। मध्य एशिया, यूरोप, तिब्बत सहित अन्य प्रदेश, जहां अक्टूबर माह में गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है, वहां से दुर्लभ प्रजाति के गिद्ध उड़ान भरकर पश्चिमी राजस्थान में पहुंच जाते है। अक्टूबर से फरवरी माह के अंतिम सप्ताह तक उनके लिए यहां अनुकूल शीत का मौसम रहता है। गिद्ध पशु बाहुल्य क्षेत्रों में ही अपना डेरा डालते है, ताकि उन्हें भोजन की तलाश के लिए भटकना नहीं पड़े। जैसलमेर जिले में कई जगहों पर पशु बाहुल्य क्षेत्रों में ये गिद्ध अपना डेरा डालते है। विशेष रूप से प्रवासी गिद्ध ओढ़ाणिया, लाठी, भादरिया, लोहटा, खेतोलाई गांव के आसपास अपना डेरा जमाते है।
ये प्रजाति पहुंचती है यहां
क्षेत्र में प्रतिवर्ष ग्रिफान, सिनेरियस, यूरेशियन, इजिप्शियन गिद्धों के झुंड प्रवास पर आते है। इसी प्रकार सफेद पीठ वाला गिद्ध, भारतीय गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध स्थानीय की श्रेणी में आते है तथा इनकी प्रजाति गंभीर रूप से खतरे में है।
यह है बड़ी समस्या
जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय कृषि व पशुपालन है। फसलों को कीटों व रोगों से बचाने के लिए किसान पेस्टीसाइड व डाइक्लोफेनिक का उपयोग करते है। इन्हीं फसलों को खाने से पेस्टीसाइड घरेलू पशुओं में पहुंचता है तथा मृत पशु को खाने से गिद्धों में पेस्टीसाइड प्रवेश कर जाता है। जिससे शारीरिक नुकसान होता है तथा प्रजनन क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में गिद्ध संकटग्रस्त प्रजाति में जाने लगा है। पूर्व में पशुओं में लगाए जाने वाले दर्द निवारक डाइक्लोफेनिक इंजेक्शन केन्द्र सरकार की ओर से बंद करवा दिए गए है। जिससे गिद्धों की मौत कुछ कम हुई है।
बढ़ाई गई है गश्त
शीतकाल के दौरान प्रवासी गिद्ध क्षेत्र में प्रवास करते है। कुछ ही दिनों में आवक शुरू होने वाली है। ऐसे में क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी गई है। रेल पटरियों के आसपास व अन्य जगहों पर कार्मिकों की ओर से अतिरिक्त गश्त की जा रही है। पेस्टीसाइड के उपयोग को कम करने को लेकर किसानों को पाबंद करने के लिए प्रशासन को पत्र लिखा जाएगा।
- जगदीश विश्रोई, क्षेत्रीय वन अधिकारी वन विभाग, लाठी।
सुरक्षा के हो पुख्ता प्रबंध
संकटग्रस्त प्रजाति के गिद्ध प्रतिवर्ष लाठी क्षेत्र में पहुंचते है। मृत पशुओं के मांस व अवशेष खाकर सफाई करते है। जिससे इन्हें सफाईकर्मी भी कहा जाता है। पूर्व में रेल की चपेट में आने से हुए हादसों में कई गिद्धों की मौत हो चुकी है। प्रशासन व वन विभाग को इनकी सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध करने चाहिए।
- राधेश्याम पेमाणी, वन्यजीवप्रेमी व जिलाध्यक्ष अखिल भारतीय जीव रक्षा विश्रोई सभा, जैसलमेर।
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