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जैसलमेर की गणगौर के शाही नजारे की बात थी निराली ...

जैसलमेर की गणगौर ;गवरद्ध के शाही नजारे की बात निराली

जैसलमेर

Published: April 04, 2022 07:51:00 pm

जैसलमेर. मरूप्रदेश की जैसलमेर रियासत प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक वैभव एवं बेजोड़ रीति-रिवाजों के लिए खास पहचान रखती है। यहां के मेलों और त्यौहारों की खुशी के मौके गीत, संगीत, नृत्य परिधान आभूषण एवं खान-पान आदि की सरिता प्रकट होकर सजीव हो उठती है। यों तो जैसलमेर अपने स्थापत्य सौन्दर्य के लिये पर्यटन के क्षेत्र में विश्व विख्यात है, लेकिन जैसलमेर की गणगौर ;गवरद्ध के शाही नजारे की बात निराली थी। उस लवाजमे का शोभायात्रा का सौंदर्य अनुपम था। मरू क्षेत्र की अनूठी आन, मान और शान की मनभावन झलक गणगौर के लवाजमे में देखने को मिलती थी। इस मेले में राजा से लेकर आम आदमी शामिल होकर अपनी भागीदारी निभाता था। आज भी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन आम जनता दुर्ग के दशहरा चौक में एकत्रित होती है। यहां जैसलमेर के कृष्ण वंशी भाटी महारावल पधारते है तथा गवर की मूर्ति की परम्परानुसार पूजा-अर्चना करते थे।
राज्य के अन्य जिलों की भांति जैसलमेर की युवतियां भी सोलह दिन पहले से गणगौर की पूजा आरम्भ कर देती है। इस मौके पर युवतियां खूब सजती-संवरती है। चैत्र सुदी तृतीया के दिन मूर्तियों को गड़ीसर तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। जैसलमेर की शाही गवर के साथ ईसर गवर की मूर्ति नहीं है। बड़े-बुजुर्ग बताते है कि कोई एक सौ साठ वर्ष पूर्व जैसलमेर के ईसर की मूर्ति को बीकानेर के महाराजा ने स्थानीय महारावल से आपसी दुश्मनी होने के कारण उठवा ली, तब से आज तक जैसलमेर की शाही गवर अकेली है। गवर की मूर्ति बड़ी आकर्षक बनी हुई है, सुहागवती नारी का सम्पूर्ण शृंगार किया हुआ है। गवर को सोने, हीरे व मोतियों से बने गहने पहनाएं हुए है। गले में निम्बोली एवं हार, कानों में झुमके, सिर पर बोरिया, नाक में नकड़ी व हाथों में भुजबंद्ध शोभायमान है। बहुमूल्य वस्त्र भी धारण है। जहां राजस्थान के अन्य जिलों में गणगौर की सवारियां या मेले चैत्र सुदी तृतीया को भरते है वहीं जैसलमेर में चैत्र सुदी चतुर्थी को शाही लवाजमे की परंपरा थी। इस दिन किले के महलों से गवर की मूर्ति को बाहर निकाला जाता है, जनता के दर्शन के लिए।
किले से ही सांय को शोभा यात्रा निकलती थी। गवर की मूर्ति को एक औरत सिर पर उठाए होती। शोभा यात्रा में सबसे आगे घोडों पर बैठे सवार नगाड़े बजाते थे। इनके पीछे शृंगारित ऊंट और इनके पीछे जैसलमेर के लोक गायक मंगणियार अपने वाद्य.पत्रों को बजाते हुए मंगल गायन करते थे साथ ही बैंड.बाजों वाले व नृत्यांगनाएं भी नृत्य मुद्राओं में होती थी । राजपरिवार के निकटवर्ती सदस्य भी इसमें शाही वस्त्र पहन कर शामिल होते थे। महारावल खुद एक घोड़े पर विराजमान होते थे तथा आम जनता का अभिवादन स्वीकार करते थे। आम लोग महारावल के जयकारे करते थे। गांवों के पूर्व जागीरदार, जमींदार व ठाकुर भी शामिल होते थे। शोभा-यात्रा प्राचीन जल स्त्रोत गडीसर पहुंचती थी। जहां गवर की विधिवत पूजा होती थी। फिर वह लवाजमा पुन: दुर्ग में पहुंचता था।
जैसलमेर की गणगौर के शाही नजारे की बात थी निराली ...
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