इस बार नहीं गूंज रहा 'आमार शोनार किला'

-कोरोना ने रोकी बंगाली सैलानियों की राह
-25 करोड़ से वंचित जैसाण की झोली

By: Deepak Vyas

Published: 22 Oct 2020, 09:37 AM IST

जैसलमेर. स्वर्णनगरी में पर्यटन को ऊंचाइयां प्रदान करने में अहम भूमिका निभाने वाले बंगाली सैलानी इस बार पूरी तरह से अपने 'आमार शोनार किलाÓ से विमुख हो गए हैं। कोरोना संक्रमण के चलते देश के पूर्वी हिस्से से सैलानी पश्चिमी सीमा के अंतिम छोर पर बसे जैसलमेर में नगण्य संख्या में भी दिखाई नहीं दे रहे। जबकि हर साल नवरात्रा स्थापना से लेकर दीवाली पर्व तक कम से कम 50 हजार और पूरे पर्यटन सीजन में 80 हजार तक बंगाली सैलानी स्वर्णनगरी भ्रमण पर पहुंचते हैं। बंगाली सैलानियों के नहीं आने से स्थानीय पर्यटन व्यवसायियों को बड़ा धक्का पहुंच रहा है।
नजर नहीं आ रहे टोपी, छाता और चश्मा
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के साथ अन्य राज्य के अन्य इलाकों से हर साल जब बंगाली सैलानी पहुंचते हैं तो उनके सिर पर टोपी, आंखों पर बड़ा-बड़ा नजर का या धूप का चश्मा और हाथों में धूप से बचने के लिए छाता उनकी पहचान हुआ करता है। बंगाली सैलानी दूर से ही अपने अंदाज से पहचान में आते हैं। जैसलमेर में कई होटलें तथा रेस्टोरेंट्स खास बंगालियों की सेवा में तत्पर रहते हैं। हर साल उनका आगमन सितम्बर-अक्टूबर माह के दौरान होता है। नवरात्र स्थापना से लेकर ठीक दीवाली से पहले तक बंगाली सैलानियों की रौनक स्वर्णनगरी से लेकर अमरसागर, कुलधरा, लौद्रवा, सम, खुहड़ी आदि दर्शनीय गांवों तक बिखरी नजर आती है।
साधनों का भी अभाव
बंगाली सैलानियों के जैसलमेर से इस बार विमुख होने की एक बड़ी वजह हावड़ा एक्सप्रेस और दिल्ली-जैसलमेर के बीच चलने वाली रोजाना की ट्रेन सेवा का स्थगित होना भी है। अनलॉक-5 चल रहा है, इसके बावजूद रेलवे ने जैसलमेर के लिए आधा दर्जन में से एक भी ट्रेन को चलाने की जहमत नहीं उठाई है। अलबत्ता आगामी दिनों में साप्ताहिक मुम्बई ट्रेन जरूर चलेगी। इससे सैलानियों की आवक में ज्यादा अंतर नहीं आएगा क्योंकि अभी बंगाली सैलानियों के आने का समय है।
जैसलमेर से खास जुड़ाव
जैसलमेर से पश्चिम बंगाल का खास जुड़ाव महान बंगाली फिल्मकार सत्यजीत रे द्वारा वर्ष 1974 में निर्देशित च्सोनार किलाज् फिल्म है। इस फिल्म की लगभग शूटिंग जैसलमेर के विख्यात सोनार दुर्ग में की गई थी। उस फिल्म की लोकप्रियता के कारण बाद के वर्षों में बंगाली सैलानी जैसलमेर आकर सोनार किला को देखने पहुंचने लगे। देखते ही देखते यह सिलसिला बढ़ता गया। वर्तमान में जैसलमेर के सोनार दुर्ग को देखते ही बंगाली सैलानियों के मुंह से बरबस निकल जाता है च्आमार शोनार किलाज्।

जैसलमेर का बड़ा नुकसान
बंगाली सैलानियों के नहीं आने के कारण जैसलमेर पर्यटन को बड़ा नुकसान पहुंचा है। इन दिनों हर साल चारों तरफ बंगाली सैलानी नजर आते हैं, लेकिन वर्तमान में वे कहीं नहीं हैं।
- अनिल भाटिया, होटल व्यवसायी

कोरोना का भय हावी
भौगोलिक रूप से जैसलमेर से बंगाल बहुत दूर है। इन दिनों कोरोना बीमारी का भय सैलानियों के मन पर हावी है। इस वजह से बंगाली सैलानी नहीं आ पाए हैं। ट्रेनों का साधन नहीं होने से भी पर्यटन का नुकसान हुआ है।
- पुष्पेंद्र व्यास, रिसोर्ट व्यवसायी


आवागमन के साधन न होने से परेशानी
कोरोना काल में यातायात के साधनों में कमी देखने को मिल रही है। आर्थिक कारण भी बंगाली सैलानियों की आवक रोकने में बड़ा कारण माना जा सकता है। शारदीय नवरात्र के दौरान बंगाली पर्यटकों की कमी पर्यटन के लिहाज से बड़ा नुकसान है।
-मेघराजसिंह परिहार, होटल व्यवसायी, जैसलमेर

उम्मीद करें कि सुधरेगी स्थितियां
जैसलमेर में देशी सैलानियों ने पर्यटन को गति दी है, वहीं सैकड़ों हाथों को रोजगार भी दिया है। कोरोना संकट में बंगाली पर्यटकों की कमी का अंदेशा था और हुआ भी यही। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगामी दिनों में परिस्थितियां बेहतर होगी और पर्यटन को गति मिलेगी।
-अनिल पंडित, एपू्रव्ड पर्यटन गाइड, जैसलमेर

Deepak Vyas Bureau Incharge
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