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जैसलमेर

टंकियों से भर रहे ट्रेक्टर टैंकर, कैसे मिले आमजन और पशुधन को पानी

मरुस्थलीय विस्तृत भूभाग में फैले जैसलमेर जिले में वर्तमान गर्मियों के मौसम में पीने के पानी की अपर्याप्त आपूर्ति की शिकायतें आम हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों से रोजाना ही अलग-अलग इलाकों से पेयजल संकट की तस्वीरें या खबरें सामने आती रहती हैं।

जैसलमेरMay 31, 2024 / 08:18 pm

Deepak Vyas

jsm
मरुस्थलीय विस्तृत भूभाग में फैले जैसलमेर जिले में वर्तमान गर्मियों के मौसम में पीने के पानी की अपर्याप्त आपूर्ति की शिकायतें आम हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों से रोजाना ही अलग-अलग इलाकों से पेयजल संकट की तस्वीरें या खबरें सामने आती रहती हैं। इस बीच जिले के दो गांवों से चौंकाने वाले वीडियो सामने आए हैं। जिनमें गांवों में बनी जीएलआर में जलदाय विभाग की ओर से किए गए नहरी पानी की आपूर्ति को ट्रैक्टर ट्रॉलियों के जरिए खाली किया जा रहा है। घुरिया गांव के सामने आए वीडियो में सरकारी जीएलआर के आसपास 20 से 25 टैक्टर मय ट्रॉली खड़े हैं। वे जीएलआर से पाइप लगाकर ट्रॉली में पानी भर रहे हैं। ऐसे में ग्रामीणों और उनके पशुधन को पीने के पानी का निश्चित रूप से संकट का सामना करना पड़ता है। दूसरा वीडियो जामड़ा गांव का बताया जाता है, जहां पानी की टंकी के पास करीब 10 टैक्टर मय टॉली खड़े हैं और एक में पाइप लगाकर पानी भरा जा रहा है। जलदाय विभाग की इन टंकियों से एक साथ हजारों लीटर पानी निकाल लिए जाने से वे निर्धारित समय से पहले खाली हो जाती हैं और पशुओं की खेली में भी पानी नहीं पहुंचता। इसी तरह से जो ग्रामीण सिर पर मटका रख कर या ऊंट अथवा गधे की पीठ पर पखाळ लाद कर पानी भरने पहुंचते हैं, उन्हें भी निराशा का ही सामना करना पड़ता होगा।

व्यावसायिक उपयोग का संदेह

जानकार सूत्र बताते हैं कि ट्रैक्टर टॉली भर कर ले जाने वाले संभवत: पानी का व्यावसायिक उपयोग कर रहे हैं। उनके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले निजी व कम्पनियों के निर्माण कार्यों में यह पानी बेचा जाता होगा। जलदाय विभाग के नियमों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर नहरी पानी देने का प्रावधान है। ऐसे ही 15 लीटर अतिरिक्त पानी प्रति व्यक्ति स्थानीय स्रोत से दिया जाना होता है। इसी 70 लीटर पानी से पशुओं के लिए भी भरपाई होती है। ऐसे में जीएलआर से टैंकर भर कर ले जाने पर ग्रामीणों के लिए पानी का संकट और गहराना स्वाभाविक है। पत्रिका पड़ताल में यह बात भी सामने आई है कि साधनहीन लोगों के यहां न तो कनेक्शन है और न ही उनके पास टै्रक्टर जैसा साधन। वे आज भी जरूरत का पानी सिर पर ढोकर लाते हैं अथवा पशु की पीठ पर लाद कर ले जाते हैं।

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