आखिर कौन दिलाएगा इस गरीब परिवार को सहारा

Dharmendra Ramawat

Updated: 18 Mar 2019, 11:27:48 AM (IST)

Jalore, Jalore, Rajasthan, India

जालोर. घर में पचपन की दहलीज पार कर चुकी बूढ़ी मां, तीन छोटे भाई और दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी लिए दुनिया के सामने ये सबसे हंसता और मुस्कुराता हुआ ही बात करते नजर आता है, लेकिन मन में छुपी टीस किसी को बता नहीं पाता। पिता थे तब तक जमीन के छोटे से टुकड़े की उम्मीद लिए ट्राई साइकिल पर इधर से उधर भाग दौड़ में लगे रहे। वो भी इसलिए कि शायद उनकी पीड़ा किसी नरमदिल अफसर के मन में घर कर जाए और किसी ना किसी योजना के तहत रहने को जमीन का टुकड़ा मिल जाए, लेकिन आखिरी सांस तक इसके लिए लडऩे के बावजूद उनके हाथ कुछ नहीं लग पाया। मन में दबी यह पीड़ा लिए वे डेढ़ साल पहले भरा-पूरा परिवार छोड़ गए। हम बात कर रहे हैं जिला मुख्यालय पर रहने वाले एक बीपीएल परिवार की। परिवार का नाम बीपीएल लिस्ट में जरूर है, लेकिन आज भी यह परिवार करीब 18 साल से सूरजपोल स्थित नगरपरिषद की छोटी सी धर्मशाला में जीवन-बसर कर रहा है। यहां ना तो कोई दरवाजा है और ना ही किसी तरह की सुविधा। प्लास्टिक के कट्टों से बना तिरपाल को ही दरवाजा बना रखा है। आंखों से कुछ देख नहीं पाने वाले घर के मुखिया निर्भयदास ६२ वर्ष का पड़ाव पार कर 5 जून 2017 को गुजर गए। शारीरिक तौर पर अक्षम होने के कारण वे अक्सर ट्राइसाइकिल पर ही इधर से उधर हुआ करते थे। घर में सबसे बड़ी दो बेटियों की शादी होने के बाद बड़े बेटे मांगीदास (23) ने ही कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी उठा रखी है। पढ़ा-लिखा नहीं होने के कारण मंदिरों में पूजा पाठ करने से मिलने वाली दान-दक्षिणा ही इस परिवार की आय का मुख्य जरिया है।
अब तक नहीं मिला आशियाना
केंद्र और राज्य सरकार की ओर से गरीब तबके के लोगों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन इस परिवार को सालों से मिन्नतें करने के बावजूद आशियना नसीब नहीं हो पाया है। जनप्रतिनिधि व अधिकारी आश्वासन जरूर देते हैं, मगर आवास तो दूर किसी तरह की मदद तक नहीं मिल रही है। जिला अधिकारी चाहें तो किसी ना किसी योजना के तहत इस परिवार को आशियाना मिल सकता है।
पेंशन भी हुई बंद
डेढ़ साल पहले तक घर के मुखिया और मांगीदास की बूढ़ी मां को पेंशन जरूर मिलती थी, लेकिन पिता के गुजर जाने के बाद वह भी बंद हो गई। माता के लिए विधवा पेंशन को लेकर आवेदन किया, लेकिन अब तक पेंशन शुरू नहीं हुई है। ऐेसे में जैसे-तैसे कर घर का खर्च चल रहा है।
भाई-बहनों को पढ़ा तक नहीं पाया
इस बीपीएल परिवार में 56 वर्षीय गोदावरी देवी के अलावा उनका बड़ा बेटा मांगीदास (23), कमलेश (15), जगदीश (12), गणेश (10), बेटी संतोष और डिम्पल रह रहे हैं। वहीं सबसे बड़ी दो बहनों की शादी हो चुकी है। इन चारों बेटों में से गणेश का पालन-पोषण व शिक्षा का खर्च सायला के एक साहुकार उठा रहे हैं, जबकि जगदीश मानसिक तौर पर कमजोर होने से गायें चराता है। वहीं कमलेश छोटा-मोटा काम करता है। इस तरह परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते पढ़-लिख नहीं पाया।
इनका कहना...
आवास के लिए जमीन को लेकर पिताजी के हाथों तैयार की गई पूरी पत्रावली आज भी हमारे पास पड़ी है, लेकिन मुझे पढऩा-लिखना नहीं आता। जनप्रतिनिधियों से लेकर जिला अधिकारियों व मुख्यमंत्री तक भी गुहार लगाई, लेकिन हमें आज तक जमीन नहीं मिली है। जिसके कारण नगरपरिषद की छोटी सी धर्मशाला में जीवन-बसर करने को मजबूर हैं। हमें उम्मीद है किसी ना किसी अफसर या जनप्रतिनिधि का दिल हमारी स्थिति को देखकर जरूर पिघलेगा। फिलहाल पूजा-पाठ से मिलने वाली दान दक्षिणा से घर खर्च चला रहे हैं।
- मांगीदास, बीपीएल, सूरजपोल जालोर

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