मेहनत हमारे किसानों की, मुनाफा गुजरात का

औषधीय फसल इसबगोल की पैदावार में जालोर जिला देश का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन इसे विड़म्बना ही कहेंगे कि सालों बाद भी यहां सुविधायुक्त बिक्री केंद्र स्थापना नहीं हो पाए

By: शंकर शर्मा

Published: 04 Jun 2015, 11:48 PM IST


अल्लाह बख्श खान
जालोर। औषधीय फसल इसबगोल की पैदावार में जालोर जिला देश का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन इसे विड़म्बना ही कहेंगे कि सालों बाद भी यहां सुविधायुक्त बिक्री केंद्र स्थापना नहीं हो पाए। सरकारी उदासीनता का ही नतीजा है कि आज भी यहां के भूमिपुत्र अपने खून-पसीने से उपजाई फसल को बेचने के लिए गुजरात जाने को मजबूर हैं। इससे जहां किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ता है, वहीं सरकार को भी हर साल राजस्व का नुकसान हो रहा है।

दरअसल, देश में इसबगोल की सबसे ज्यादा उपज राजस्थान में होती है। इस औषधीय फसल के उत्पादन में जालोर की बहुत बड़ी भागीदारी है। राज्य की करीब सत्रह फीसदी उपज अकेले जालोर में होती है। हालांकि जिले में इसकी बिक्री को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने भीनमाल को इसबगोल की विशिष्ट मण्डी का दर्जा दे रखा है, लेकिन यहां सुविधाओं का अभाव है। राज्य सरकार की ओर से न तो इसे विकसित करने के प्रयास किए गए न ही इसकी खरीद को बढ़ावा देने के लिए निवेशकों को आकर्षित किया गया। यही वजह है कि यहां खरीददारों का टोटा होने से किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा। ऎसे में किसानों को गुजरात की ऊंझा सहित अन्य मण्डियों में उपज बेचने जाना पड़ता है।

सरकारी नीतियां जिम्मेदार

गुजरात में इसबगोल से सम्बन्घित उद्योग विकसित हैं। वहां बाजार की उपलब्धता है, जबकि जालोर में बाजार की उपलब्धता नहीं है। ऎसे में किसानों को इसबगोल की उपज की उचित कीमत नहीं मिल पाती। इसके लिए सरकारी नीतियां भी जिम्मेदार हैं। जालोर में इसबगोल से सम्बन्घित औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने के लिए कोई खास नीति ही नहीं बनाई गई। साथ ही आधारभूत सुविधाओं व कनेक्टिविटी का भी अभाव है।

17 हजार टन की उपज

कृषि विभाग के अनुसार वर्ष2005 से 2010 तक के वार्षिक औसत के लिहाज से राजस्थान में प्रति वर्ष1 लाख 79 हजार 510 हैक्टेयर भूमि में इसबगोल की खेती की जाती है। इसमें बाड़मेर में 54 हजार 633 हैक्टेयर भूमि तथा जालोर में 38 हजार 411 हैक्टेयर भूमि में इसबगोल की खेती की जाती है। जबकि पांच साल के औसत के लिहाज से प्रति वर्ष राजस्थान में 82 हजार 938 टन उत्पादन होता है, जबकि बाड़मेर में सालाना उपज 16 हजार 980 टन व जालोर में 15 हजार 666 टन की उपज होती है। हालांकि वर्ष2012-13 में राजस्थान में 99 हजार 950 टन इसबगोल का उत्पादन हुआ, इसमें से बाड़मेर में 22 हजार 62 टन व जालोर में 17 हजार 264 टन उत्पादन हुआ।

मिल सकता है पूरा मोल

जालोर में खरीदारों की कमी के चलते किसानों को उचित मूल्य मिलने की समस्या रहती है। चूंकि यहां के किसान मौसम के अनुसार फसल बोते हैं। ऎसे में लम्बे समय तक फसल की बिक्री रोक पाना सम्भव नहीं होता। ऎसे में उन्हें मजबूरी में गुजरात में फसल बेचने जाना पड़ता है। इससे परिवहन लागत व समय की बर्बादी होती है। गुजरात की माफिक अगर जालोर में आधारभूत सुविधाएं व इसबगोल आधारित उद्योग विकसित किए जाएं तो किसानों को उपज का पूरा मोल मिल सकता है।

विशेष योजनाएं बनानी चाहिए

स्थानीय स्तर पर बिक्री को बढ़ावा देने के लिए मण्डियों के आस-पास ही प्रोसेसिंग व ग्रेडिंग यूनिट लगाई जा सकती है। आधारभूत सुविधाएं विकसित कर निवेशकों को आकर्षित करने के लिए विशेष योजनाएं बनानी चाहिए। हालांकि जिले में बनने वाले एग्रो फूड पार्क में इसबगोल से सम्बंधित प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रस्ताव दिया है।
- डॉ. के.एन.सिंह, उप निदेशक, कृषि विस्तार, जालोर
शंकर शर्मा
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