भाद्राजून किले में है जिले की सबसे गहरी बावड़ी, यहां की सुंदरता देखने आते हैं सैलानी

Dharmendra Ramawat

Publish: Feb, 03 2019 11:07:03 AM (IST)

Jalore, Jalore, Rajasthan, India

रणजीतसिंह राठौड़
भाद्राजून. कस्बे में भाद्राजून किले के अन्दर स्थित प्राचीन बावड़ी जालोर समेत आसपास के क्षेत्रों में स्थित बावडियों में सबसे गहरी बावड़ी मानी जाती हैं। यह बावड़ी दिल के आकार की होने से यहां आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। पहाड़ों के मध्य स्थित होने से यह प्राकृतिक सौन्दर्य का एक अलग नमूना भी पेश करती है।बावड़ी के पास ही भगवान शिवजी का प्राचीन मंदिर हैं। बावड़ी के आसपास प्राचीन कला से निर्मित अलग-अलग प्रकार के घाट बने हुए है, जो बावड़ी की शोभा बढ़ाते हैं। बावड़ी के निकट एक ओर छोटी बावड़ी है, जिसका पानी बडी बावडी से मिला हुआ है, जहा पर प्राचीन पद्धति से पानी को निकालने के लिए प्राचीन उपकरण लगे हुए है। जिस पर बाल्टीनुमा मिट्टी के बर्तन जिसे स्थानीय भाषा में लोग घेहड़ कहते है। उसमें पानी भरकर निकालते थे।

प्रजा के हित के लिए किया था निर्माण
11वीं शताब्दी में 111 सीढिय़ों ने निर्मित बावड़ी का निर्माण पूर्व के शासको द्वारा किया गया था पुराने समय में सीढीदार कुएं बनाए जाते थे।इन कुओं को बावडिय़ों के नाम से जाना जाना जाता था। इसी तरह ऐसे ही भाद्राजून किले की बावड़ी का निर्माण किया गया। पूर्व के शासको ने अपनी प्रजा के हित मे इसका निर्माण करवाया था। वही यह बावड़ी देखने में बहुत सुन्दर और आर्कषक हैं। इस बावड़ी की सुन्दरता देखने के लिए देशी-विदेशी पर्यटक इस स्थान पर आते हैं। कहा जाता है कि इस बावड़ी के साथ कई किस्से और कहानियां जुड़ी हुई हैं।
कई साल से नहीं सूखी भाद्राजून की यह बावड़ी
इस बावड़ी में कई साल से पानी नहीं सूखा हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में कई बार अकाल पडऩे पर भी इस बावड़ी का पानी पूरी तरह से कभी नहीं सूखा है।हांलाकि पूर्व में पानी गहराई तक जरूर चला गया था। माना जाता है कि भगवान शिवजी के वरदान से इसमें पूरी तरह से पानी कभी नहीं सूखा। बरसात के समय में पहाड़ों से उतरने वाले झरनों से इस बावड़ी में पानी आता हैं। पास में एक छोटी नहर बनी हुई है जिसमें पहाड़ो से आने वाले बरसाती पानी के साथ मिट्टी पत्थर आदि वहीं नहर में रूक जाते है और साफ पानी ऊपर से बावड़ी में चला जाता हैं। कभी-कभी अच्छी बरसात होने पर यह बावड़ी पूर्ण रूप से भर जाती हैं।ं जिससे आज भी स्थानीय ग्रामीण इसके पानी का प्रयोग करते हैं।
उस समय जल संरक्षण का प्रमुख स्रोत थी...
मान्यताओं के अनुसार यह बावड़ी भाद्राजून किले के पूर्व शासकों ने बनाई थी। वास्तुकारों और वहां के लोगों द्वारा जल संरक्षण और वाटर हार्वेस्टिंग के लिए बनाई गई थी, जिनमें काफी पानी जमा रहता है। यह पानी किले के निवासियों के वार्षिक उपयोग के काम में आता था। इस बावड़ी के बीच एक बड़ा गहरा कुआ भी है। यहां मंदिर में दर्शन को जाने से पहले हाथ-मुंह धोना एक पवित्र परंपरा मानी जाती है। 16 शताब्दी में निर्मित इस सुन्दर शिव मंदिर में आज भी उस प्राचीन काल की वास्तुकला और मूर्तिकला के दर्शन होते हैं।

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