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2227 industries of the district spewing poison, the affected areas are eating dust in exchange for CSR

जिले में स्थापित छोटे एवं बड़े मिलाकर २२२७ उद्योग क्षेत्र के लोगों के लिए जी का जंजाल बने हुए हैं। हालांकि क्षेत्र के चुनिंदे लोगों को इससे रोजगार जरूर मिल रहा है लेकिन इससे उलट ९० फीसदी लोगों को केवल राखड़ धूल डस्ट ही मिल रहा है। जो क्षेत्र के लोगों को काल के गाल में ले जा रहा है। खासकर इन दिनों डभरा क्षेत्र के उद्योगों का राखड़ लोगों के नाक में दम कर रखा है। दिलचस्प यह है कि इन उद्योगों को सीएसआर मद यानी (कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) उद्योगों की सामाजिक जिम्मेदारी में जो राशि दी जानी है

जांजगीर चंपा

Published: May 11, 2022 09:42:24 pm

जिसके चलते क्षेत्र के लोगों को इस राशि का लाभ नहीं मिल पाया। भले ही इस राशि से कोरोना संकट के समय वेंटीलेटर खरीदी व क्वारेंटाइन सेंटरों में सुविधा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, इसके बाद बीते एक साल से उद्योगों ने न तो किसी तरह की सीएसआर मद के लिए राशि दी और न ही क्षेत्र में विकास कराया। ऐसे में उद्योग से प्रभावित लोग केवल धूल डस्ट खाने मजबूर हैं। इन्हें रोकने न तो ढंग का पर्यावरण विभाग का दफ्तर है और न ही सेटअप। आदमी यदि शिकायत करे तो करे कहां। बस ग्रामीण अंचल के लोग कलेक्टोरेट आते हैं और ज्ञापन सौंपकर चले जाते हैं। विडंबना यह है कि जांच के लिए टीम गठित की जाती है फिर जांच टीम भी उद्योगों से जांच के नाम पर खानापूर्ति कर चले जाती है। अलबत्ता समस्या का निराकरण नहीं हो पाता।
सबसे अधिक १४ बड़े उद्योग बने काल के गाल
जिले में सबसे बड़े १४ उद्योग शामिल है। जिसमें मड़वा पॉवर प्लांट, केएसके वर्धा पॉवर प्लांट, डीबी पॉवर प्लांट, आरकेएम, अथेना, पीआईएल सहित १४ बड़े प्लांटों से सबसे अधिक राखड़ एवं काले डस्ट निकल रहे हैं। जिसके निस्तारण के लिए उद्योगों के पास जगह नहीं है। ऐसे में उद्योग खाली पड़े मैदानों में तो कहीं गड्ढों को पाटने के लिए काम आ रहा है। सबसे अधिक सक्ती क्षेत्र में इस तरह का विवाद बढ़ रहा है। यहां आरकेएम पावर जेन को छह माह पहले पर्यावरण विभाग ने ८९ लाख रुपए पेनाल्टी ठोका था। जिसमें उद्योग का बड़ा नुकसान हुआ था। इसके बाद भी क्षेत्र में यही ढर्रा बदस्तूर जारी है।
क्रशर उद्योग भी कम नहीं
जिले में सबसे अधिक क्रशर उद्योग पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिले में १७८ क्रशर उद्योग हैं। जो क्षेत्र के लोगों के लिए काल के गाल बने हुए हैं। हद तो यह हो जा रही है जब ऐसे ही क्रशर उद्योगों के चलते पूरा गांव उजड़ जा रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण चांपा के पास देवरहा में देखा जा सकता है। चांपा के गेमन पुल के अंदर से आप जब बिरगहनी होते हुए देवरहा की ओर जाएंगे तो जहर उगल रहे क्रशर के लाल डस्ट का गुबार आसमान में छाए दिखेगा। इसके कारण पूरे गांव को इधर उधर शिफ्ट होना पड़ रहा है।
जरूरत पडऩे पर ही दरवाजा खटखटाने का...
सूत्रों का कहना है कि सीएसआर मद की राशि देने में सरकार ने नियम में बदलाव लाया है। जिसमें उद्योगों को जरूरी नहीं है कि वे ग्रामीणों के दबाव में आकर प्रभावित क्षेत्र में विकास करे। नियम यह है कि उद्योग कलेक्टर के डिमांड पर जरूरी राशि उनके खाते में जमा करेगी। इसके बाद कलेक्टर तय करेंगे कि उस राशि का इस्तेमाल कहां की जाए। पहले होता यह था कि ग्रामीणों की मांग पर उद्योग सुविधा के लिए सड़क, पानी स्कूल भवन जैसे मूलभूत विकास कार्यों को करा देते थे, लेकिन अब कहां क्या विकास होगा यह कलेक्टर तय करेंगे।
वर्जन
जिले के उद्योगों ने कोरोना के दौरान सीएसआर मद की राशि दी थी। इसके बाद अभी राशि नहीं आई है। यदि कोई बोल रहा है कि उसने राशि दी है तो यह गलत है।
- पायल पांडेय, उप संचालक, जिला योजना एवं सांख्यिकी
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