CG Human Story : कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पत्नी तो नि:शक्ता से जूझ रहे दो बच्चे, पिता लाचार इलाज कराए कि पाले परिवार

CG Human Story : कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पत्नी तो नि:शक्ता से जूझ रहे दो बच्चे, पिता लाचार इलाज कराए कि पाले परिवार

Vasudev Yadav | Publish: Mar, 17 2019 06:46:03 PM (IST) Janjgir Champa, Janjgir Champa, Chhattisgarh, India

- इलाज कराने रायपुर जाने से रोजी मजदूरी छूटी, दैनिक चीजों के लिए भी दोनों बच्चे पूरी तरह पिता पर आश्रित

जांजगीर-चांपा. पत्नी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही है तो दूसरी ओर दो बच्चे, दोनों ही 50 प्रतिशत तक नि:शक्त। रोजमर्रा के जरूरतों के लिए माता-पिता पर आश्रित। घर की माली हालत भी खराब है। पति रोजी मजदूरी छोडक़र पत्नी का इलाज कराने जाए तो घर में बच्चों को कौन पाले। कैंसर के इलाज कराने मदद के लिए पति ढाई महीने से भटक रहा है।

संघर्षों से जूझती यह कहानी जिला मुख्यालय जांजगीर से लगे ग्राम पेण्ड्री के दुर्गाप्रसाद यादव की है जो अपनी पत्नी श्याम बाई और दो बेटे संजय एवं सत्यम के साथ पेण्ड्री में रहता है। जीवन में दुखों का पहला पहाड़ तब टूटा जब उनके दोनो बच्चे नि:शक्त हुए। इसे ही नियति मानकर दुर्गा प्रसाद रोजी-मजदूरी करके किसी तरह परिवार को पाल रहा था कि जिंदगी ने दूसरा बड़ा झटका दिया, उसकी पत्नी श्यामबाई को जब बच्चेदानी और सीने में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी होने का पता चला। इसके बाद तो उसकी जिंदगी ही बिखर गई। ढाई महीने से श्याम बाई का इलाज मेकाहारा अस्पताल रायपुर में चल रहा है। जहां हर 15 दिन में ही क्रीमोथैरेपी करानी पड़ रही है। इलाज तीन साल तक चलेगा। ऐसे में दुर्गा के सामने अपने दो नि:शक्त बच्चों के परिवरिश को लेकर भारी संघर्षां से जूझना पड़ रहा है।

पांच दिनों से जिला अस्पताल में भर्ती है श्याम बाई
श्यामबाई वर्तमान में जिला अस्पताल जांजगीर में भर्ती है। दुर्गा प्रसाद ने बताया कि मेकाहारा में डॉक्टरों ने खून की कमी बताकर खून चढ़वाने कहा। पत्नी को लेकर वे गांव आ गए और जिला अस्पताल में भर्ती कराया। उसे दो बॉटल खून की जरूरत है मगर यहां ब्लड बैंक से एक ही बॉटल खून मिला। ब्लड बैंक में एबी पॉजिटिव खून नहीं है। उसे एक और बॉटल खून की जरूरत है।
पत्नी का इलाज कराऊं तो बच्चों को कौन पाले
दुर्गा प्रसाद ने बताया कि हर 15 दिन में क्रीमोथैरेपी की जरूरत पड़ेगी। महीने में दो बार रायपुर मेकाहारा जाना पड़ रहा है। तीन साल तक इलाज चलेगा। रायपुर आने-जाने से रोजी-मजदूरी छूट गई है। ऐसे में इलाज कैसे कराएं और दोनों बच्चों को कैसे पालू। दोनों पूरी तरह आश्रित है। घर में एक छोटी बेेटी है जो किसी तरह उन्हें देख रही है मगर बिना पैसे घर कैसे चलेगा। कर्ज में जिंदगी चल रही है।

प्रशासन से नहीं मिली कोई आर्थिक मदद
अपनी पीड़ा बताते हुए दुर्गा प्रसाद के आंसू निकल आए। उसने बताया कि प्रशासन से अब तक कोई आर्थिक मदद नहीं मिल पाई है। पिछले महीने 18 तारीख को कलेक्टर जनदर्शन में भी मैंने मदद की गुहार लगाई थी। सरकारी अस्पताल में इलाज ही बस हो पा रहा है। आने-जाने और परिवार चलाने के लिए आर्थिक मदद नहीं मिल रही। वहीं नि:शक्त होने के बाद भी दोनों बच्चों को विकलांगता पेंशन भी नहीं मिल रहा। दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनाकर दे दिया गया है।

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