बचपन में नहीं पूरी हुई संगीत सीखने की तमन्ना तो फैमली ड्यूटी पूरी कर

बचपन तमन्ना फैमली ड्यूटी पूरी करने बाद

डॉ. संदीप उपाध्याय@रायपुर. कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, फिर वह किसी भी क्षेत्र का ज्ञान क्यों न हो। राजधानी में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो ५० की उम्र पार करने के बाद संगीत सीखने पर रुचि ले रहे हैं। इनके अंदर संगीत सीखने का ऐसा जुनून और ललक है जो युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। यह लोग उम्र की बंदिशें और झिझक छोड़कर नियमित रूप से संगीत सीखने के लिए रियाज कर रहे हैं और समय पर क्लास भी ले रहे हैं। पत्रिका ने जब कुछ ऐसे ही सुर साधकों से बात की तो कुछ ने कहा कि वह अपना का सपना पूरा करना चाहते हैं तो कुछ ने कहा कि खाली समय में इससे अच्छा साथी और दूसरा नहीं हो सकता है।

बचपन तमन्ना फैमली ड्यूटी पूरी करने बाद
रायपुर निवासी 55 वर्षीय सांत्वना धगट शास्त्रीय गायन की विधिवत तालीम विगत 5 वर्षों से मंजूषा बेड़ेकर से हासिल कर रही हैं। इन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से शास्त्रीय गायन की 4 वर्षों की मध्यमा परीक्षा भी दी है। शास्त्रीय गायन के अलावा सुगम एवं फिल्मी संगीत गायन में सांत्वना कई मंचों पर अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं। वर्तमान में वह सितार वादन सीख रही हैं और उन्हें यह करके काफी अच्छा लग रहा है। सांत्वना घटक ने बताया कि उनका संगीत से लगाव बचपन से ही है। पिता राइस मिल में थे ट्रांसफर होते रहने के चलते बचपन में संगीत नहीं सीख पाईं। शादी के बाद पारिवारिक दायित्व पूरा करने में लगी रहीं। अब फैमली ड्यूटी पूरी करने के बाद बचपन की तमन्ना पूरी कर रही हैं।

संगीत सीखने के लिए रायपुर जैसा माहौल नहीं
रिटायर्ड ब्रिगेडियर और आर्थोपैडिक सर्जन की पत्नी निवेदिता लहरी 57 साल की उम्र में संगीत सीख रही हैं। इन दिनों वह कमला देवी संगीत महाविद्यालय में अपने गुरु अनिल राय के मार्गदर्शन में सितार वादन सीख रही हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय परिवेश में लड़कियों को बाहर पढऩे के लिए न भेजने के चलते वह संगीत नहीं सीख सकीं, लेकिन उनका संगीत से लगाव हमेशा रहा। पति सेना में थे उनके साथ 35 साल रही तो अपनी बेटी को संगीत सिखाकर अपने अरमान पूरे किए। रिटायरमेंट के बाद जब पति रायपुर शिफ्ट हुए तो संगीत विद्यालय खोजना शुरू किया। उनकी तलाश कमलादेवी संगीत महाविद्यालय पहुंच कर पूरी हो गई। जब पता चला कि वहां गायन के साथ ही सितार वादन भी सिखाया जाता है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। संगीत सीखने के लिए रायपुर अच्छा पूरे भारत में शहर नहीं है। वह इस उम्र में कालेज गोइंग स्टूडेट्स के साथ संगीत सीख रही हैं और उन्हें बच्चों का काफी प्यार और सहयोग मिल रहा है। आज सभी युवा स्टूडेट्स उनके दोस्त बन चुके हैं। पहले डर लगता था कि क्लास में उनके तानों से संगीत नहीं सीख पाऊंगी, लेकिन अब ऐसा कुछ महसूस ही नहीं हो रहा है।

युवावस्था में पेंटिंग ने किया संगत से दूर तो अब पूरे किए अरमान
58 वर्षीय जयश्री भाग्वानानी इन दोनों कमला देवी संगीत महाविद्यालय में सितार वादन में विशारद कर रही है। उन्होंने इससे पहले भी सितार वादन में विशारद का कोर्स किया है, लेकिन अब पारिवारिक जिम्मेदारियां कम होने से खाली समय में फिर से नियमित क्लास लेने लगी है। उन्हें दोबारा विशारद का कोर्स करते हुए तीन साल हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि वह पेशे पेंटर हैं। वह साइंस की स्टूडेंट्स थी लेकिन उन्होंने पेंटिंग्स लगाव हमेशा रखा। इसके चलते वह पढ़ाई के दौरान संगीत नहीं सीख सकीं। गला सही न होने के चलते उन्होंने वाद्य यंत्र सीखना चाहा और सितार सीखना शुरू किया। जयश्री की सास शीला भग्वानानी का भी संगीत से काफी लगाव है और उनका उन्हें काफी सपोर्ट भी मिलता है। संगीत से लगाव के चलते उनके बेटे ने तबला वादन में और बेटी ने गायन में विशारद किया है।

सीखने की कोई उम्र नहीं होती यह संगीत सीखने के दौरान पता चला

रायपुर निवासी 52 वर्षीय पूजा दानी गायन में कमला देवी संगीत महाविद्यालय से विशारद कर रही हैं। यह उनका दूसरा साल है। कॉलेज गोइंग स्टूडेंट्स के साथ गायन का कोर्स करके उन्हें अपने कॉलेज के दिन याद आते हैं। वह काफी खुश हैं और उनका कहना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है यह उन्हें अब पता चला। पूजा को बचपन से ही गाने का काफी शौक था। शादी के बाद परिवार के दायित्व इतना व्यस्त हुईं कि समय ही नहीं मिला। अब जब परिवारिक ड्यूटी पूरी हो गईं, तो अपने लिए कुछ समय निकालने के लिए सोचा। इसी बीच उनकी मुलाकात कमलादेवी संगीत महाविद्यालय की टीचर मंजूसा बेडेकर से हुई। उन्होंने उन्हें प्रेरित किया और वह पिछले

sandeep upadhyay Reporting
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