बुधवार को उगते सूर्य को अघ्र्य देने के साथ हुआ छठ महापर्व समापन

सुबह छठ घाटों में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा

By: Amil Shrivas

Published: 15 Nov 2018, 11:05 AM IST

जशपुरनगर. बुधवार को व्रतियों ने उगते सूर्य को अध्र्य दिया। इसके साथ ही 36 घंटे तक चलने वाले सूर्य अराधना के छठ महापर्व का समापन हुआ। सुबह छठ घाटों में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा था। वहीं आतिशबाजी से आसमान गूंज रहा था।
बुधवार को उगते सूर्य को अध्र्य देने के लिए व्रतियों के परिजनों का तड़के 3 बजे से छठ घाटों में आने का सिलसिला शुरू हो गया था। व्रतियों के परिजनों की टोली सिर पर पूजन सामग्री लिए निर्धारित स्थान में जमने लगी थी। सुबह 5 बजे तक शहर के देउलबंध तालाब घाट, नया छठ घाट, गायत्री मंदिर के पास स्थित घाट सहित बांकी नदी के घाट में श्रद्धालुओं की भीड़ जुट गई थी। भोर से ही घाटों पर भगवान सूर्य के स्वागत में लोग आतिशबाजी करते रहे। व्रत करने वाली महिलाओं की अराधना को देखने के लिए शहरवासी ठंड की परवाह न करते हुए छठ घाटों की ओर उमड़ पड़े थे। जिससे छठ घाट परिसर एवं महाराजा चौक पर रौनक छा गई। मन्नत मांगने वाले व मनौती पूरी होने वाले व्रती कंपकपाती ठंड मेेंं कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्योदय होने तक भगवान भास्कर की अराधना करते रहे।
सूर्य प्रतिमा की हुई पूजा
मंगलवार की शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अध्र्य देने के बाद छठ घाट में स्थापित किए गए भुवन भास्कर की प्रतिमा का पूजा-पाठ चलता रहा। रात 8 बजे से यहां अखंड रामायण पाठ किया गया। जिसके बाद रात भर भजन-कीर्तन के साथ छठ गीत गूंजते रहे। समिति के सदस्यों ने यहां तालाब के घाट के किनारे पंडाल लगाकर सूर्य भगवान की प्रतिमा स्थापित की थी। इस स्थल में विशेष सजावट की गई थी।
3 दिन तक धूम रही छठ पूजा की: शहर के प्राय: हर गली-मोहल्ले से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने छठ व्रत किया था। इसके चलते तीन दिन तक शहर छठ मइया की भक्ति के रंग में रंगा रहा। यहां छठ पर्व की धूम तो रहती ही है साथ ही साल दर साल व्रतियों की संख्या भी बढ़ रही है। पहले केवल देऊलबंध के घाट में छठ पूजा की जाती थी। व्रतियों की संख्या बढऩे पर गायत्री मंदिर तालाब के पास, शांति भवन तालाब एवं बाकी नदी के कई स्थानों में व्रत करने वालों की कतार लगी हुई थी। व्रतियों के अध्र्य देने के बाद जब व्रती के परिजन दौरा व सूपा लेकर घाट से निकल रहे थे, तो उनसे सूपा का प्रसाद लेने के लिए लोगों में होड़ मच गई थी।
सूर्य की पहली किरण से छाई खुशी : कमर तक पानी में डूबे हुए व्रती पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बेसब्री से सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रहे थे। व्रतियों और श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस समय खुशी छा गई, जब सुबह की लालिमा आकाश पर छाने लगी। जैसे ही सूर्य देव के दर्शन हुए व्रतियों ने उन्हें अध्र्य देकर विधि-विधान से उनका पूजन किया। व्रत करने वाली महिलाओं ने जब सूर्य देव की आरती कर तालाबों के पानी में जब दीए छोड़े, तो तालाब टिमटिमाते दीयों की रोशनी से जगमगा उठा। इसके साथ ही मनौतियां व मनोकामना के लिए रखा व्रत पूर्ण किया गया।

सूर्य प्रतिमा को पहुंचाया गया बालाजी मंदिर : मंगलवर को शोभायात्रा के साथ भगवान सूर्य की प्रतिमा को बालाजी मंदिर से ला कर छठ घाट में स्थापित किया गया था। छठ घाट में भगवान भास्कर की पूजा-अराधाना करने एवं बुधवार की सुबह उगते सूर्य को अध्र्य देने एवं हवन-पूजन के बाद प्रतिमा को पुन: बालाजी मंदिर पंहुचाया गया।

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