अब कमजोर हो गयी जौनपुर की प्रसिद्ध मूली

जौनपुर की मूली अौर मक्का देश भर में प्रसिद्द

जौनपुर.  कभी जौनपुर की मूली अौर मक्का प्रसिद्ध था और दूसरे जिलो के लिए यह कौतुहल का विषय बना रहता था लेकिन आज वह अपना वजूद खो चुकी है। इसके पीछे कई कारण बताये जा रहे हैं। मूली की खेती यहां कुछ विशेष क्षेत्रों में होती थी। जहां मकान बन जाने से तथा उसकी लागत न मिलने के कारण एवं अपेक्षित प्रोत्साहन न मिलने के कारण किसानों का इससे मोहभंग हो गया। परिणाम यह है कि 15 से 17 किलो तक वजन की मूली अब 5 से 7 किलो की भी मुश्किल से हो पा रही है। यहां की माटी मूली जब दूसरे जिलो में जाती थी उसे देखने के लिए भीड़ लग जाती थी। 

मकर संक्रान्ति के अवसर पर लोग बहन-बेटियों के घर खिचड़ी के रूप में लाई- चूड़ा, गट्टा तथा अन्य सामानों के साथ बड़ी और मोटी मूली भी ले जाना जनपद की शान समझते थे। यह जितनी मोटी होती थी उतना ही इसका महत्व माना जाता था अौर वह दर्शनीय होती थी। 

धीरे-धीरे विकास की अंधी दोड़ में जौनपुर की मूली अपना मूल वजूद खो रही है। इसके लिए उपयुक्त जमीन पर जहां मकान बन चुके हैं वहीं किसान कम समय में ज्यादा सब्जियां उत्पादन देने वाले प सल पर ध्यान लगे हैं। शहर के खासनपुर, मकदूमशाह अढ़न, पुराना बान दरीबा तथा राजपूत कङ्क्षठी के पीछे ताड़तला आदि जगह मोटी अौर वजनदार मूली के लिए उपसयुक्त जगह थी। इसकी खासियत थी कि यह कुछ उपजाऊ जमीन पर ही अपना विकास कर पाती थी। आज उन्ही जमीनों पर आलीशान मकान बन गये हैं। जगह सिमट गया है। 

किसान उचित लागत न मिलने से इसकी खेती करने से परहेज करने लगे हैं। पहले किसान मूली की खेती अगैती करते थे। जो मकर संक्रान्ति आते- आते अपने पूर्ण अवस्था में आ जाती थी। जिसका वजन 15 से 17 किलङ्क्ष होता था। लोग मोटी मूली उपहार के रूप में देते थे। कृषि विभाग व अन्य संस्थायें इसके लिए किसानों को पुरस्कृत कर उनका उत्साह बढ़ाने का काम करते थे लेकिन इन संस्थाअों का रुझान खत्म होने लगा तो किसान मूली की पिछैती खेती करने लगे अौर आकार तथा वजन कम होकर 7 किलो तक सिमट गया। किसानों का कहना हे कि मोटी मूली के लिए फसल की देखभाल बच्चों की तरह करनी पड़ती है किन्तु बाजार में आने के बाद इसकी मूल लागत मिलना भी कठिन हो गया। 
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Ashish Shukla
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