17 हजार पौधे रोपने के बाद भी हाथीपावा की पहाडिय़ां वीरान

17 हजार पौधे रोपने के बाद भी हाथीपावा की पहाडिय़ां वीरान

Arjun Richhariya | Updated: 04 Jun 2019, 11:06:48 PM (IST) Jhabua, Jhabua, Madhya Pradesh, India

पर्यावरण दिवस पर विशेष : कटती पहाडिय़ां, जमीदोज पेड़, नाले- तालाबों पर हो रहे कब्जे

झाबुआ. हमारी जिंदगी से पर्यावरण प्रभावित होता है और पर्यावरण से हमारी जिंदगी। कटती पहाडिय़ां, जमीदोज पेड़, नाले- तालाबों पर कब्जे कह रहे हैं कि इसकी कीमत चुकानी होगी।

प्रशासन और जनभागीदारी से यहां के लोग हाथीपावा को जंगल का आकार दे चुके हैं। हाथीपावा पर पौधरोपण जो फेसबुक और वॉट्सएप्प और सोशल मीडिया पर हुआ। इसकी जमीनी हकीकत कुछ और है। प्रशासन , एनजीओ व जनसहयोग से पहाडिय़ों को हराभरा करने का दावा किया। विभागीय आंकड़ों में 17 हजार पौधे महज 5 वर्षो के भीतर लगाए गए, लेकिन पहाडिय़ां आज भी वीरान है। जलसंकट पर जारी आंकड़ों के मुताबिक क्षेत्र में सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा 85 फीसदी भूमिगत जल का दोहन किया जाता है। शेष इस्तेमाल घरेलू और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए होता है। भूमिगत जल में बढ़ते प्रदूषण पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक साल भर में होने वाली कुल बारिश का कम से कम 31 प्रतिशत पानी धरती के भीतर रिचार्ज के लिए जाना चाहिए, लेकिन एक शोध के मुताबिक कुल बारिश का औसतन 13 प्रतिशत पानी ही धरती के भीतर जमा हो रहा है।20 से 30 फीट चौड़ा नाला अब 2 बाय 3 रह गया : बरसात के पानी को तालाब और नदियों तक ले जाने वाले सभी नाले जिमीदारों की सांठगांठ से अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। तालाब, नदियों तक बरसात का पानी नहीं पहुंच रहा। मेघनगर नाका, राजगढ़ नाका, कुरैशी कम्पाउंड, कलिकामाता मंदिर, सज्जनरोड, कॉलेज मार्ग, रानापुर मार्ग, बस स्टैंड, कलेक्टरेट आदि स्थानों से 20 से 30 फीट चौड़े नाले को 2 बाय 3 के संकीर्ण नालियों में बदल दिया। बहते नालों को समेट कर उस पर घर बनाएं।

प्यास बुझाने वाले तालाब सूखने की कगार पर : केकरोड़ों रुपए खर्च के बाद भी मेहताजी का तालाब जलकुंभी से पट गया। बहादुर सागर तालाब कमल की खेती में सिमट गया। धमोई तालाब सूख रहा है। छोटा तालाब सौन्दर्यीकरण की भेंट चढ़ गया। जाकरूक नागरिक जितेन्द्रसिंह राठौर ने तालाब की सुध लेने जनहित याचिका लगाई है। कचरा गंदगी के साथ सौ से ज्यादा घरों का ड्रेनेज तालाब में मिल रहा है। छोटे तालाब को सौंदर्यीकरण के नाम पर पोखर बना दिया, जो खुले सैफ्टी टैंक में बदल गया।

े आधार पर पूर्ति करना संभव नहीं
जिले के पानी की स्थिति देखें तो पीएचई विभाग और नगरपालिका दोनों ही विभागों को अपने अधीन आरहे जलस्त्रोतों की वर्तमान परिस्थितियों की कोई उपडेट जानकारी उपलब्ध नहीं। दोनों ही विभाग के अधिकारी यह मानते है कि संपूर्ण क्षेत्र में पानी की मांग अनलिमिटेड है। मांग के आधार पर पूर्ति करना संभव नहीं। वर्तमान आंकड़े के अनुसार पीएचई के अधीन कुल 13287 हैंडपंप संचालित है। नए खनन हैंडपंप के आंकड़े भी अपडेट नहीं है। हैंडपम्प की संख्या में 1 हजार 354 किसी न किसी कारण से बंद पड़े हंै। नगरपालिका के अनुसार शहर में 304 बोरिंग हैं। जिसने 28 4 पुराने एवं अ_ारह नए हैंडपंप खोदे गए। नगरपालिका के आंकड़ों में 19 हैंडपम्प बंद है।

पत्रिका ग्राउंड रिपोर्ट के आंकड़े
पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार मई माह समाप्त होने तक जिले के 40 प्रतिशत जल स्त्रोत दम तोड़ चुके हैं। शहर से सटे बाड़कुआं गांव के 6 हैंडपम्प में 5 बंद है। मेलपाड़ा, सजवानी छोटी, आमलिमाल, नल्दी, बामनसेमलिया, नेगडिय़ा, मोहनपुरा, देवझिरिपंडा, गोलाएपारा, ढेकल, पिपलिया , मेघनगर, डुंगराधन्ना, डूंगरा लालू, मण्डली नाथू गांव सहित दूरस्थ अंचलों का भी यही हाल है। गोपाल कॉलोनी, बसंत कॉलोनी, बिलीडोज, मौजीपड़ा, माधोपुरा, चर्च मोहल्ला, रामदास कॉलोनी, उदेपुरिया, कुम्हारवाड़ा, वनवासी आश्रम, रातीतलाई, मुख्यबाजार, कॉलेज मार्ग सभी क्षेत्रों में 45 से अधिक हैंडपम्प बंद हैं। शहर भर में निजी बोरिंग के आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं। जिले भर में हो रही सभी वैध-अवैध बोरिंग के कारण जल स्तर में चिंताजनक कमी आई है।

प्लास्टिक बैग खेतों को बंजर बना रहे
जिले में प्लास्टिक बेग खेतों को बंजर बना रहे है। ट्रेचिंग ग्राउंड पर जैविक खाद बनाने में लाखों खर्च किया, लेकिन खर्च किए रुपयों का उपयोग होने की जगह रहवासियों को धुंए, बदबू के अतिरिक्त प्लास्टिक बेग उड़कर खेतों में पहुंचने से चारोलीपाड़ा के किसानों की मुसीबत बढ़ गई है। जल स्त्रोतों के आसपास साफ -सफाई का अभाव भी बीमारियां फैला रहा है।
मांग के आधार पर पूर्ति करना संभव नहीं : जिले के पानी की स्थिति देखें तो पीएचई विभाग और नगरपालिका दोनों ही विभागों को अपने अधीन आ रहे जलस्त्रोतों की वर्तमान परिस्थितियों की कोई उपडेट जानकारी उपलब्ध नहीं। दोनों ही विभाग के अधिकारी यह मानते है कि संपूर्ण क्षेत्र में पानी की मांग अनलिमिटेड है। मांग के आधार पर पूर्ति करना संभव नहीं। वर्तमान आंकड़े के अनुसार पीएचई के अधीन कुल 13287 हैंडपंप संचालित है। नए खनन हैंडपंप के आंकड़े भी अपडेट नहीं है। हैंडपम्प की संख्या में 1 हजार 354 किसी न किसी कारण से बंद पड़े हंै। नगरपालिका के अनुसार शहर में 304 बोरिंग हैं। जिसने 28 4 पुराने एवं अ_ारह नए हैंडपंप खोदे गए। नगरपालिका के आंकड़ों में 19 हैंडपम्प बंद है।

पत्रिका ग्राउंड रिपोर्ट के आंकड़े : पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार मई माह समाप्त होने तक जिले के 40 प्रतिशत जल स्त्रोत दम तोड़ चुके हैं। शहर से सटे बाड़कुआं गांव के 6 हैंडपम्प में 5 बंद है। मेलपाड़ा, सजवानी छोटी, आमलिमाल, नल्दी, बामनसेमलिया, नेगडिय़ा, मोहनपुरा, देवझिरिपंडा, गोलाएपारा, ढेकल, पिपलिया , मेघनगर, डुंगराधन्ना, डूंगरा लालू, मण्डली नाथू गांव सहित दूरस्थ अंचलों का भी यही हाल है। गोपाल कॉलोनी, बसंत कॉलोनी, बिलीडोज, मौजीपड़ा, माधोपुरा, चर्च मोहल्ला, रामदास कॉलोनी, उदेपुरिया, कुम्हारवाड़ा, वनवासी आश्रम, रातीतलाई, मुख्यबाजार, कॉलेज मार्ग सभी क्षेत्रों में 45 से अधिक हैंडपम्प बंद हैं। शहर भर में निजी बोरिंग के आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं। जिले भर में हो रही सभी वैध-अवैध बोरिंग के कारण जल स्तर में चिंताजनक कमी आई है।
प्लास्टिक बैग खेतों को बंजर बना रहे : जिले में प्लास्टिक बेग खेतों को बंजर बना रहे है। ट्रेचिंग ग्राउंड पर जैविक खाद बनाने में लाखों खर्च किया, लेकिन खर्च किए रुपयों का उपयोग होने की जगह रहवासियों को धुंए, बदबू के अतिरिक्त प्लास्टिक बेग उड़कर खेतों में पहुंचने से चारोलीपाड़ा के किसानों की मुसीबत बढ़ गई है। जल स्त्रोतों के आसपास साफ -सफाई का अभाव भी बीमारियां फैला रहा है।

सरकारें बस एडवाइजरी जारी कर देती हैं
& लोगों को मौसम नहीं मारता, बल्कि गरीबी और लाचारी जो उन्हें प्रतिकूल मौसम में बाहर निकलने को मजबूर कर देती है। ुझुलसा देने वाली गर्मी को प्राकृतिक आपदा मानने का कोई प्रावधान सरकारी नियम-कायदों में नहीं है। बस एडवाइजरी जारी कर देती हैं कि लोग गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए यह करें और यह न करें।
डॉ. नवीन बामनिया,
पर्यावरण प्रेमी व शिशुरोग विशेषज्ञ।

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