जिले की फसलों में फॉल आर्मीवर्म कीट लगने की आशंका, किसान रहें अलर्ट

- कीट के पतंगें हवा के बहाव के साथ एक रात में 100 किमी तक प्रवास कर सकते हैं, 80 से अधिक प्रकार की फसलों को चट कर जाता है

झाबुआ. किसानों के लिए चिंता भरी खबर है। कृषि वैज्ञानिकों ने सूखे और कीटों से फसल चौपट होती देखने वाले किसानों को सतर्क होने के लिए अलर्ट किया है। जिले में सबसे अधिक मक्का-ज्वार की फसल होती है और फॉल आर्मीवर्म (स्पोडोपटेरा फ्यूजेरियम) कीट इन फसलों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है।

जिले में मक्का, ज्वार इत्यादि फसलों में फाल आर्मीवर्म की पूरी आशंका है। इस हानिकारक कीट के प्रकोप के संबंध में भी जागरूक व सजग रहें। फाल आर्मीवर्म बहुभक्षी कीट है। जो कि 80 से अधिक प्रकार की फसलों पर क्षति करता है, परंतु मक्का सबसे पसंदीदा फसल है। इस कीट के पतंगें हवा के बहाव के साथ एक रात में करीब 100 किलोमीटर तक प्रवास कर सकते हैं। इसकी प्रजनन क्षमता भी बहुत अधिक है। मादा अपने जीवन काल में करीब 1 से 2 हजार अंडे दे सकती है। यह कीट झुंड में आक्रमण कर पूरी फसल को कुछ ही समय में नष्ट करने की क्षमता रखता है। पड़ोसी राज्यों में इस कीट के प्रकोप को देखते हुए मप्र में भी प्रकोप होने की प्रबल संभावना है।
जीवन चक्र-
फाल आर्मीवर्म का जीवन चक्र ग्रीष्मकाल में लगभग 30 दिनों का होता है। बसंत एवं शरद ऋतु में जीवन काल 60 दिनों का हो जाता है तथा शीतकाल में बढ़कर 80-90 दिनों का होता है। मौसम के अनुसार इस कीट की कई पीढिय़ां होती है। वयस्क मादा अपने जीवनकाल में 1500 से 2000 तक अंडे देती हैं। इसके अंडे उभरे हुए डोम के आकार के होते हैं। इनकी गोलाई 0.4 एवं ऊंचाई 0.3 मिमी. होती है। मादा अंडे समूह में पत्ती के निचली सतह पर देना पसंद करती है परन्तु अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों के उपरी सतह पर एवं दोनों पर भी देती है। अंडसमूह बालों से ढके रहते है। गरम वातावरण में अंडकाल 2-3 दिनों का होता है। अंडे से निकली इल्लीयॉ हल्के पीले रंग की होती है तथा सिर का रंग काला एवं नारंगी होता है। इल्ली के बढऩे के साथ-साथ रंग हरा, पीला, भूरा एवं काला हो जाता है। व्यस्क इल्ली का रंग हल्के भूरे से गहरा भूरा होता है। पूर्ण विकसित इल्ली 30 से 36 मि.मी. लम्बीं होती है एवं सिर में सफेद रंग का उल्टा अंग्रेजी का वाई जैसी आकृति दिखाई देती है। इल्ली के पाश्र्व सहत पर 3 पीली लकीरेे पाई जाती है एवं उदर के अंतिम खंड में चार काले बिन्दु होते हैं। इल्ली अवस्था वातावरण के अनुसार 12 से 20 दिनों की होती है। पूर्ण विकसित इल्ली भूमि में मिट्टी एवं रेशमी धागों से कोया बनाकर शंखी में परिवर्तित हो जाती है। शंखी अवस्था 7 से 35 दिनों की होती है जो कि बाहरी वातावरण एवं तापक्रम पर निर्भर करती है।

व्यस्क पतंगा-
व्यस्क पतंगा रात्रिचर होता है। इसकी लम्बाई 2 से 3 से.मी. तथा पंख फैलाने पर चौड़ाई 3 से 4 से.मी. होती है। इसके अग्र पंख गहरे भूरे, धूसर काले रंग के हल्के तथा गहरे चित्तेदार होते है। नर पतंगें के अग्र पंख के उपरी किनारे पर सफेद रंग का धब्बा स्पष्ट दिखाई देता है। पश्च पंख मटमैला सफेद रंग का होता है तथा किनारे पर भूरी लकीर होती हैं। पतंगे 2 से 3 सप्ताह तक जीवित रहते हैं।
क्षति करने का तरीका-
अंडों से निकली छोटी-छोटी इल्ल्यिां पत्तियां के हरे भाग को खुरच-खुरच कर खाती हैं। फलस्वरूप पत्तियों में सफेद रंग के धब्बे बन जाते है। इल्लियों पौधों की पोगली के अंदर छुपी रहती है। बड़ी इल्लियां पत्तियों को खाकर उसमें छोटे से लेकर बड़े-बड़े गोल छेद कर नुकसान पहुंचाती हैं। इल्लियों की विष्ठा भी पत्तियों पर साफ दिखाई देती है। बड़ी अवस्था की इल्लियां भुट्टों एवं मंजरियों को भी खाकर नुकसान पहुंचाती है।
कीट प्रबंधन-
समन्वित कीट नियंत्रण विधियों को अपनाकर ही इस कीट की रोकथाम एवं नियंत्रण किया जा सकता है। पघ्ऊाल आर्मीवर्म कीट की रोकथाम के लिए मक्का बीज को बोनी से पहले सायनट्रेनिलीप्रॉल 19.8 प्रतिशत $ थायोमिथॉक्जाम 19.8 प्रतिशत का 4 मिली. प्रति किलो बीज की दर से उपचाररित कर बौनी करें। गहरी जुताई करके शंखी अवस्था को नष्ट करें। समय पर बुआई करें। देरी से बोई गई फसल पर कीट प्रकोप अधिक होता है। मक्का के साथ अरहर ,मूंग, उड़द आदि को अन्तवर्ती फसल के रूप में लें। संतुलित उर्वरकों का अनुशंसित मात्रा में प्रयोंग करें।
हाथों से अंड गुच्छो एवं इल्लियो को नष्ट करें। फ्युजीपरडा फिरोमोन प्रपंच 15 प्रति हेक्ट. का उपयोग करे।
टी आकार की खूटिया लगाये 30-40 प्रति हेक्टेयर। अनुशंसित पौध अंतरण पर बुआई करें। ग्रसित फसल की पोंगली में लकड़ी का बुरादा, राख एवं बारीक रेत डाले। जिन क्षेत्रों में खरीफ ली जाती है, उन क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन मक्का ना लें तथा अनुशंसित फसल चक्र अपनाएं।
जैविक नियंत्रण-
प्रकोप की प्रारंभिक अवस्था में नीम तेल 10000 पी.पी.एम. या एन.एस.के.ई. 5 प्रतिशत का एक लीटर प्रति हेक्टर छिडकाव करें। जैविक कीटनाशक जैसे बिवेरिया बेसियान, मेटारायजियम एनीसोपोली या बैसिलस थुरिन्जेन्सिस (बी.टी.) या एन.पी वाइरस 1 लीटर प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव करें।
रसायनिक नियंत्रण-
सिन्थेटिक कीटनाशकों में थायोडीकार्प 75 डब्लू पी 1 किलोग्राम या फ्लूबैन्डामाइट 48 0 एस.सी. 150 मिली. या क्लोरेन्टनीलीप्रोली 18 .5 एस.सी. 150 मिली. या इमामेक्टीन बैन्जोएट 5 एस.जी. का 200 ग्राम या स्पीनोसेड 45 एस.सी. का 200 मिली./हेक्टेयर उपयोग करें। कीटनाशकों का उपयोग बदल बदल कर करना चाहिए। जहरीला चुग्गा का प्रयोग करें इसके लिये 10 कि.ग्रा. धान के चोकर में 2 कि.ग्रा. गुड़ तथा 2-3 लीटर पानी में 100 ग्राम थायोडिकार्प मिलाकर पौधों की पोंगली में डाले।

लगातार फसलों की निगरानी रखें
लगातार फसलों की निगरानी रखे एवं कीट प्रकोप दिखाई देने पर रासायनिक कीटनाशकों का तुरंत उपयोग करें, साथ ही कीट व्याधी का प्रकोप होने की जानकारी तुरंत कृषि विस्तार अधिकारीयों एवं जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र को दें।
-जीएस त्रिवेदी, उप संचालक, किसान कल्याण तथा कृषि विकास।

अर्जुन रिछारिया Incharge
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