लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके पेड़ों की 29 प्रजातियों को बचाने के लिए तैयार किए साढ़े 3 लाख पौधे

वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त झाबुआ की मौजीपाड़ा नर्सरी के साथ आलीराजपुर व धार जिले की कुल 11 नर्सरियों में तैयार किए पौधे

झाबुआ. विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके 20 पेड़ों की प्रजातियों को बचाने के लिए वन विभाग ने संरक्षण अभियान शुरू किया है। इसके तहत वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त झाबुआ के अंतर्गत आने वाली झाबुआ, आलीराजपुर व धार जिले की कुल 11 नर्सरियों में ऐसे 3 लाख 52 हजार पौधे तैयार किए हैं। इन्हें अन्य पौधों के साथ लगाने की तैयारी की जा रही है। ताकि आने वाले समय में फिर से ये किस्में जंगल में खड़ी हो जाए।

दरअसल वन विभाग की ओर से 10 साल के वर्किंग प्लान के दौरान खुलासा हुआ कि प्रदेश के जंगलों में पाई जाने वाली पेड़ों की 216 प्रजातियों में से 29 प्रजातियों के पेड़ बहुत कम बचे हैं। जबकि जैव विविधता के लिए ये बेहद जरूरी है और इनके अन्य कई औषधिय उपयोग है। लिहाजा वन विभाग ने लुप्त होने की कगार पर पहुंचे इन पेड़ों करे बचाने के लिए संरक्षण कार्यक्रम की योजना बनाई। इसके तहत वन क्षेत्रों में होने वाले पौधारोपण के दौरान 10 प्रतिशत इन पेड़ों को लगाने का निर्णय लिया। इसके लिए सभी नर्सरियों में पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
मौजीपाड़ा में तैयार किए 50 हजार पौधे-
वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त झाबुआ की मौजीपाड़ा नर्सरी में विलुप्त हो रही 29 प्रजातियों के 50 हजार पौधे तैयार किए गए हैं। इसके अलावा झाबुआ जिले की अनास, देवझरी व बनी, आलीराजपुर जिले की मन्नाकुआ, डाबच्या व इंदवन और धार जिले की माही, मटनागरा, कुंदा, करंजवानी व रामपुरा में कुल 3 लाख 52 हजार पौधे तैयार किए गए हैं। ये सभी नर्सरियां वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त झाबुआ के अधीन आती है। यहां से इन पौधों को वन विभाग को उपलब्ध कराया जा रहा है।

30 प्रतिशत से भी कम बचे हैं ये पेड़-
प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में पाए जाने वाले इन महत्वपूर्ण पेड़ों की स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है। क्योंकि इनकी तादाद 30 प्रतिशत या इससे भी कम रह गई है। इससे जैव विविधता का संतुलन गड़बड़ाने की आशंका खड़ी हो गई है। विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यदि अब नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ी के लिए इन पेड़ों की प्रजातियां केवल किताबों में ही रह जाएगी।

अब तक सागौन का ही संरक्षण
वन संरक्षण के नाम पर वन विभाग अब तक सागौन का ही संरक्षण करता रहा है। इसकी वजह सागौन का बााजार मूल्य अधिक होना है। इसके चलते सागौन की कटाई और चोरी की घटनाएं अधिक होती है। अन्य प्रजातियों के मामले में विभाग इतना गंभीर नहीं रहा। यही वजह है कि इन प्रजातियों के पेड़ों की कटाई धड़ल्ले से होती रही और किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया।

ये पेड़ पहुंच चुके हैं विलुप्ति की कगार पर-
बहेड़ा, बीजा, कुसुम, सोनपाठा, अंजन, लसोड़ा, कालाशीशम, धौबिन, पाडर, पुत्रजीवा, रोहन, बिल्मा, अचार, धामन, तिन्सा, पिपल, बड़, गुलर, लाल चंदन, मौल श्री, कुल्लू, कद?ब, कैथा, सफेद पलाश, खुरसानी इमली, रीठा, दहिमन, खटाम्बा, हल्दू।

लुप्त होती प्रजातियों को बचाना है-
हमारा उद्देश्य लुप्त हो रही पेड़ों की प्रजातियों को बचाना है। इसके लिए पूरा विभाग लगा है। इस बार वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त झाबुआ के अंतर्गत आने वाले तीन जिलों की 11 नर्सरियों में साढ़े 3 लाख से अधिक पौधे तैयार किए गए हैं। जिन्हें अन्य पौधों के साथ जंगल में लगाया जाएगा। इससे ये प्रजातियां संरक्षित रहे।
आरसी गेहलोत, एसडीओ, वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त, झाबुआ
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अर्जुन रिछारिया Incharge
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