पौधरोपण बन कर रह गया और पौधे सूखने के कगार पर

झालावाड़ जहां सरकार पौधरोपण पर लाखों रुपए खर्च कर रही है।

By: Hari Singh gujar

Updated: 04 Jan 2018, 02:26 PM IST

खानपुरिया ग्राम पंचायत के मंगलनाथ डूंगरी पर मनरेगा में लगाए करीब पांच हजार पौधों पर करीब १५ लाख रुपए खर्च किए। लेकिन यह पौधे संभाल के अभाव में पौधे सूखने के कगार पर है।

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प्रशासन के अधिकारियों ने यहां पौधरोपण कर इनकी संख्या तो बढ़ा दी।
किसी को नियुक्त नहीं करने के कारण यह पौधे सूख रहे है। हालांकि मंगलनाथ वाटिका में लगाए पौधे तो चल रहे है। लेकिन इस परिसर के बाहर लगाए और पौधे भी सूख गए है। ऐसे में अब बाहरी और लगाए पौधों का धरी-धोणी नहीं है। वाटिका के बाहर लगाए अधिकांश पौधे सूख गए है।
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-पत्थरों की कोट भी हटाई

 

मुख्य सड़क से मंगलनाथ डूंगरी पर जाने वाले मार्ग के दोनों और पत्थर की कोट कर इन पौधों को सहेजने का संकल्प लिया था। लेकिन यह पत्थर की कोट भी अब हट गई है। ऐसे में जानवर घुसने के बाद इन पौधों को खा रहे है। ऐसे में अधिकांश पौधों का अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर ही है।

-दो माह से नहीं आया मजदूर
पौधरोपण के बाद जिला प्रशासन ने अपने स्तर पर यहां मजदूर का प्रबंध किया था। जो पानी पिलाने एवं इन पौधों को सहेजने का कार्य किया करता था। लेकिन गत दो माह से यहां कोई मजदूर नहीं आया। ऐसे में पानी पिलाने के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण परेशानी हो रही है।

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-कुछ पौधे जानवर खा गए

मंगलनाथ डूंगरी पर जाने वाले मार्ग के दोनों और दांई एवं बांई और लगाए कुछ पौधे तो जानवर खा गए। जबकि मंगलनाथ वाटिका के बाहरी हिस्से में लगे पौधों को गाय चट कर गई। ऐसे में पौधरोपण अभियान का सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। उधर लोगों का मानना है कि जो पौधे लगाए गए। इन पौधों की संभाल की जाती तो यह वृक्ष कुंज के रूप में विकसित हो जाता। वहीं हरियाली का एक अनोखा स्थल यह वाटिका बनती।


-रोड का इंतजार

मंगलनाथ वाटिका पर रोड से ऊपर जाने के लिए फिलहाल कच्चा रास्ता है। लेकिन इसके ऊपर जाने के लिए जो नया रोड बनाया जाना था।लेकिन छह माह बाद भी यह रोड नहीं बन पाया है। इसके चलते वाटिका पर जाने में भी परेशानी होती है। दुपहिया वाहन से जाने में यहां संतुलन बिगडऩे का भय भी बना रहता है।


-नर्सरी से लाया पानी भी बेकार


फिलहाल वाटिका में लगाए पौधों के लिए नर्सरी से सीधे एक पानी की लाइन डालकर पानी का प्रबंध किया था। लेकिन इसके बाद भी यहां पौधों के बाद इनको सहेजने व पानी देने के लिए कोई सिस्टम विकसित नहीं किए जाने के कारण यह सिर्फ नाम का ही पौधरोपण बन कर रह गया।

Hari Singh gujar
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