विदेशी किस्मों से सरसब्ज होंगे संतरे के बगीचे

संतरा उत्कृष्टता केंद्र में तैयार की जा रही पौध

By: arun tripathi

Updated: 01 Mar 2020, 04:08 PM IST

अरुण त्रिपाठी
झालावाड़. संतरा उत्पादन के क्षेत्र में झालावाड़ जिले को देश का अग्रणी बनाने तथा विदेशों में निर्यात बढ़ाने को लेकर यहां राज्य सरकार ने वर्ष 2014 में 10 करोड़ रुपए का बजट जारी कर झालरापाटन कस्बे के निमोदा रोड पर उद्यानिकी उत्कृष्टता केन्द्र की स्थापना की स्वीकृति दी। इसमें से करीब 550.15 लाख रुपए निर्माण कार्य पर खर्च हो गए। बाद में वर्ष 2015 में शेष राशि 449.85 लाख रुपए खर्च कर केन्द्र को संतरा फसल के लिए ही स्थापित किया गया। यहां पर आगामी दिनों में किसानों को संतरे की विभिन्न देशी व विदेशी किस्मों के पौधे तैयार कर क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के लिए दिए जाएंगे, ताकि वे अपनी आय बढ़ा सके।
संतरा उत्कृष्टता केंद्र संयुक्त निदेशक आरडी सिंह ने बताया कि 2016-17 से किसानों को नई तकनीक और किस्मों से अवगत कराया जा रहा है। केंद्र द्वारा अब तक संतरे की 10 विभिन्न किस्मों का रोपण 7.50 हैक्टेयर में किया जा चुका है। अभी यहां कई किस्मों के मदर प्लांट तैयार किए जा रहे हैं, कुछ माह बाद किसानों को पौध उपलब्ध कराई जाएगी। 27 फरवरी 2019 को केंद्र पर किसान मेला और संतरा शो का आयोजन किया। इसमें क्षेत्र के 1400 प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया, इन्हें उन्नत तकनीक से अवगत कराया।
दी जा रही जानकारी
केंद्र पर समय-समय पर जिले सहित राज्य से पहुंचने वाले किसानों का मार्ग दर्शन किया जा रहा है। कोटा संभाग सहित धोलपुर, अजमेर, दौसा सहित अन्य जिलों से पहुंचे सैंकड़ों किसानों को संतरा उत्पादन की नई तकनीक और किस्मों से अवगत कराया जा चुका है।
केंद्र के उद्देश्य
गुणवत्ता युक्त पौध रोपण सामग्री किसानों को उपलब्ध कराना। नए बगिचों की स्थापना के लिए उन्नत तकनीक की जानकारी देनाए, ताकि फलों की गुणवत्ता में सुधार कर निर्यात को बढ़ाया जा सके। संतरा फलों की फसलोत्तर प्रबंधन के लिए सरंचना विकसित करना, संतरा बगिचों में सघन पौध रोपण द्वारा फलों का उत्पादन बढ़ाना, संतरा बगिचों में कीट रोग प्रबंधन, तकनीकी कटाई-छटाई, पोस्ट हार्वेस्ट तकनीक आदि की जानकारी उपलब्ध कराना।
इन किस्मों के मदर प्लांट हो रहे तैयार
नागपुरी सीडलेस
यह किस्म क्लोनल सिलेक्शन प्रजनन विधि द्वारा नागपुरी संतरा से सीसीआरआई नागपुर द्वारा विकसित की। पौधे फैले हुए, लंबी तथा मध्यम चौड़ी पत्तियों वाले होते हैं। बीजों की संख्या नगण्य होती है। इस किस्म के फल बड़े आकार के, सिरों से धंसे हुए तथा हरे-नारंगी रंग के मोटे छिलके युक्त होते हैं। इनका औसत फल वजन 140 ग्राम होता है।
क्लेमेनटाइन संतरा
इस किस्म को विलोलीफ मैंडरिन ऑरेंज और स्वीट ऑरेंज के क्रास से विकसित किया है। यह किस्म अफ्रीका व मेडिटेरियन क्षेत्र में मुख्य रूप से प्रसिद्ध है। इस किस्म के पौधे मध्यम आकार के, घनी पत्तियों वाले और लगातार उपज देने वाले होते हैं। फल वजन 115 ग्राम होता है। बीजों की संख्या कम या बीज रहित होने से बाजार में मांग अधिक रहती है।
मिखाल संतरा
यह क्लेमेनटाइन और डेजी संतरा के स्वाभाविक संकरण से विकसित किस्में है। इसकी उत्पत्ति इजरायल में हुई। से वहां की जलवायु के लिए अनुकूलित है। इसका व्यवसायिक उत्पादन भी इजराइल व कैलिफोर्निया में होता है। इसके पौधे एकान्तरित फलन वाले तथा फल अगेती पकने वाले होते हैं। सामान्यतया फल अक्टूबर से दिसंबर तक पक जाते हैं।
डेजी संतरा
यह संकर संतरा किस्म फॉर्चुन एवं फ्रिमोंट संतरा के संकरण से यूएस कृषि विभाग कैलिफोर्निया में विकसित की। पौधे ऊपर की ओर बढऩे वाले, बड़े, कांटे रहित तथा एकांतर फलन वाले होते हैं। इन पर बड़े गुच्छों में फल लगते हैं। फल आकार में बड़े, गहरे चमकीले नारंगी रंग के, आसानी से छिलने योग्य होते हैं। ये दिसंबर से जनवरी में पक जाता है।
खासी संतरा
इस संतरा की खेती मुख्यत: भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों आसाम तथा मेघालय में होती है। इसे मेघालय स्थित खासी पहाड़ी के कारण खासी संतरा कहा जाता है। पौधे मध्यम से ऊंचे तथा सीधे बढऩे वाले, सघन, कांटे युक्त या कांटे रहित तथा लंबी चौड़ी पत्तियों युक्त होते हैं। इसके फल मध्यम मोटे 100 से 140 ग्राम वजनी होते हैं। फल नवंबर से दिसंबर में पक जाते हैं।
किन्नू संतरा
इसकी खेती राजस्थान के गंगानगर, हनुमानगढ़ क्षेत्र तथा पंजाब में बहुतायत से होती है। इसे सिट्रस एक्सपेरिमेंट स्टेशन, कैलीफोर्निया में विकसित किया। भारत में किन्नू का पौधरोपण सर्वप्रथम फल अनुसंधान स्टेशन अबोहर, पंजाब में हुआ। पौधे ओजपूर्ण, ऊपर की ओर बढऩे वाले तथा कांटे रहित होते हैं। फल 150 से 170 ग्राम तक होते हैं।
ये भी लगे
फिमोंट, मरकट, फेयरचाइल्ड, हरियाणा से संतरे के विदेशी सहित अन्य किस्मों के मदर प्लांट भी यहां मौजूद हैं।

केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर किसानों की समस्याओं का समाधान किया जाता है। गुणवत्ता पूर्ण पैदावार बढ़ाने की नई तकनीक से किसानों को अवगत कराना केंद्र का मकसद है। संतरे में कीट व्याधी पर नियंत्रण कर किसानों को वेहतर उत्पादन करने की जानकारी दी जा रही है।
आरडी सिंह, संयुक्त निदेशक, संतरा उत्कृष्टता केंद्र, झालावाड़
संतरे की फसल मौसम पर डीपेन्ड करती है। वातावरण के उतार-चढ़ाव से फलाव-घटता बढ़ता है। किसानों को समय-समय पर जागरूक किया जाता है।
कैलाश शर्मा, सहायक निदेशक, उद्यान विभाग, झालावाड़
सरकार द्वारा बजट जारी करने पर किसानों को जानकारी देने के लिए सेमीनार, कार्यशाला और किसान मेले का आयोजन किया जाता है। इस साल 2019-20 में 13-14 लाख रुपए का बजट सरकार की तरफ से मिला है। जब भी कोई किसान या दल जानकारी लेने आता है, केंद्र के वैज्ञानिकों, हॉर्टिकल्चर कॉलेज, अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों, कर्षि अधिकारियों और पर्यवेक्षकों द्वारा जानकारी दी जाती है।
डॉ. दिनेश सिंह, उपनिदेशक, उद्यान, झालावाड़

-झालरापाटन के सेमलीखाम गांव निवासी संतरा उत्पादक ओमप्रकाश पाटीदार ने बताया कि उसकी 5 बीघा का संतरे का बगीचा है। संतरा उत्पादन की नवीन तकनीक व अन्य जानकारी के लिए संतरा उत्कृष्टता केन्द्र, कृषि विज्ञान केन्द्र व हॉर्टीकल्चर से लगातार संपर्क में रहता हूं।
-सुनेल निवासी किसान श्यामलाल गुर्जर ने बताया कि संतरे के बगीचे में 170 पौधे लगा रखे हैं, जब भी बगीचे में रोग लगता है तो कृषि विभाग को अवगत कराकर उसमें जैविक दवाइयों का उपयोग करते हैं।
-सुनेल क्षेत्र के कांदलखेड़ी गांव निवासी सूरजमल धाकड़ ने बताया कि संतरे के बगीचे में 150 पौधे लगा रखे हैं। केंद्र पर जाकर वैज्ञानिकों की सलाह से समय-समय पर पौधों को उपचार करता हूं।
-हिम्मतगढ़ निवासी गोवर्धन सिंह ने बताया है कि उन्होंने 8 बीघा भूमि पर करीब 5 वर्ष से संतरे का बगीचा लगा रखा है। अभी कई पौधों में कालीमसी रोग देखने को मिल रहा है। वैज्ञानिकों की सहायता से दवाइयों का छिटकाव किया है।
-हिम्मतगढ़ निवासी रोहित ने बताया है कि उन्होंने 1 बीघा भूमि पर करीब 4 वर्ष से संतरे का बगीचा लगा रखा है। पौधों में काली मस्सी राग के होने से पौधों में दवाइयों का छिटकाव किया है।

arun tripathi Desk
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