झांसी की एकता गुप्ता की कहानी, जिन्होंने अपने ससुर को लीवर दान कर बचायी जिंदगी

कैसे तैयार हुईं लीवर प्रत्यारोपण के लिए, कैसे हुईं इंस्पायर जानिए सब कुछ

By: Hariom Dwivedi

Updated: 22 Jul 2021, 12:07 PM IST

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
झांसी. यह कहानी है झांसी की एकता गुप्ता की। जिन्होंने अपने ससुर को लीवर दान कर उनकी जिंदगी बचायी। एकता गुप्ता को लीवर दान करने की प्रेरणा कैसे मिली। वह कैसे दूसरों के लिए भी प्रेरणास्पद हो सकती है पढि़ए एकता गुप्ता कहानी, उन्हीं की जुबानी- मेरे ससुर लीवर सिरोसिस से पीडि़त थे। अभी कुछ साल पहले हमने उनके लीवर में ट्यूमर का ऑपरेशन कराया जिसके बाद उन्हें पॉलीप्स होने लगा। डॉक्टरों को डर था कि यह फिर से विकासशील ट्यूमर हो सकता है। हमने सभी दवाओं और उपचार की कोशिश की। इलाज के लिए विशेषज्ञों के पास भी ले गए, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। लीवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र विकल्प बचा था।

महज संयोग मेरा लीवर ही प्रत्यारोपण के योग्य
पहले यह इतना आम नहीं था। लोग डरे हुए थे लेकिन हमने एक मौका लेने का फैसला किया। हमारे परिवार के सभी सदस्यों का परीक्षण किया गया। अफसोस है हममें से मेरे अलावा कोई और किसी न किसी कारणों से चिकित्सा स्थिति के कारण लीवर दान देने के योग्य नहीं था। मैंने तुरंत अपना लीवर दान करने का फैसला किया। डॉक्टरों ने मुझसे कई बार पूछा और पुष्टि करने के लिए मेरे माता-पिता को भी फोन किया। बहुतों ने मुझसे कहा, "ओह! तुम जवान हो। अपना शरीर खराब मत करो", "तुम्हारा बच्चा है", "सर्जरी आपको कमजोर करके छोड़ देगी। लेकिन, इस वक्त मुझे अपनी पंद्रह साल की उम्र याद आ रही थी। तब मैं बहुत छोटी थी जब मेरे पापा का देहांत हो गया था। उनकी खाने की नली में कैंसर था। उसके बाद, मैं टूट गयी थी। सारा दिन रोती थी और सालों तक प्रार्थना करना भी बंद कर दिया था। लेकिन, शादी के तुरंत बाद मुझे अपने ससुर जी में एक पिता तुल्य रूप दिखा। वह अपनी बेटी की तरह मेरी देखभाल करते थे और यहां तक कि मेरी पढ़ाई में भी सहयोग करते थे। मैंने शादी के बाद पीजी और कई कोर्स किए। मेरी प्रेग्नेंसी में भी वे मेरा बहुत ख्याल रखते थे।

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...पिता नहीं पर पिता से कम नहीं
इसलिए इस बार जब मुझे अपने पिता को बचाने का मौका मिला तो मैंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। मैंने तुरंत चेकअप करवाया और बिना किसी हिचकिचाहट के सभी कागजात पर हस्ताक्षर किए। सर्जरी से पहले, डॉक्टरों ने मुझे बताया कि वे मेरे लीवर का 60 प्रतिश (40-45 प्रतिशत शरीर में पुन: उत्पन्न होने की उम्मीद होती है) ले रहे हैं और मेरे पित्ताशय को पूरी तरह से हटा देंगे जिससे मुझे लंबे समय में पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन, मैंने यह सब कुछ जानने के बाद भी लीवर दान करने का फैसला लिया। हम आपातकालीन प्रत्यारोपण के लिए गए और कुछ ही दिनों में, मैं और पापा जी स्वस्थ होकर घर वापस आ गए। अस्पताल में कई नर्सें मुझसे पूछती रहीं, "आप दान लीवर दान कर रही हैं? क्या वह आपके पिता हैं?" इस सवाल पर मैं बस मुस्कुरा दिया करती थी। कहती थी पिता नहीं लेकिन पिता से "वह कम भी नहीं हैं"।

-Humans of Jhansi फेसबुक ग्रुप से मिली जानकारी के अनुसार

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Hariom Dwivedi
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