.....उसने दंगों, लाशों के ढेर, अकाल, विभाजन की तस्वीरें खींची थीं

.....उसने दंगों, लाशों के ढेर, अकाल, विभाजन की तस्वीरें खींची थीं

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पीसी जोशी अर्काइव में सुनील जाना की तस्वीरें देखने को मिली थी।

झाँसी. किसी विषय में रूचि रखना और उस विषय की गहरी जानकारी रखना दोनों ही अलग-अलग बाते हैं। फोटोग्राफी का शौक रखने वाला हर व्यक्ति सुनील जाना को जानता हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन जिन्हें सुनील जाना के बारे में थोड़ी जानकारी दी जाती है, वह बहुत कुछ जानना चाहता है। दरअसल सुनील जाना एक प्रेस फोटोग्राफर और डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कार्य के लिए प्रतिष्ठित रहे हैं। उनकी स्मृति को जीवंत बनाने के लिए चंबल के सामाजिक कार्यकर्ता शाह आलम ने एक अनोखी पहल की है।

पद्मश्री थे सुनील जाना

शाह आलम बताते हैं कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन पर काम करते हुए सुनील जाना से जुड़े दस्तावेजों की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ा। उन्हीं दिनों जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पीसी जोशी अर्काइव में सुनील जाना की तस्वीरें देखने को मिली थी। लिहाजा उनके काम से मुरीद होना लाजिमी था। इसी बीच यह विवाद भी पढ़ने में आया कि भारत सरकार ने सुनील जाना को पद्मश्री देने की घोषणा कर दी। सरकार और अवार्ड दिए जाने की इस सूचना पर अधिकारियों की काफ़ी किरकिरी हुई थी क्योंकि पद्मश्री से उन्हें 1974 में ही सम्मानित किया जा चुका था। आखिरकार सरकार ने कहा कि गलती से पद्मश्री घोषित हो गया, दरअसल देना तो हम पद्मभूषण चाहते थे। उसके बाद यह खबर मिली की सुनील जाना 21 जून, 2012 को नहीं रहे।

चंबल क्षेत्र में फोटोग्राफी को बढ़ावा देना है मकसद

शाह आलम आगे कहते हैं कि बीते साल मई-जून-जुलाई में चंबल घाटी के बीहड़ो में रहने के दौरान एक सस्ती सी मोबाइल से जो तस्वीरें खींची थी, वह सुनील जाना की तस्वीरों के साथ चंबल की तस्वीरों की प्रदर्शनी के दौरान इंदौर में प्रदर्शित हुई। इस प्रदर्शनी में देश के 22राज्यों से प्रतिनिधियों ने हिस्सेदारी की थी। वरिष्ठ फिल्म निर्देशक एम एस सथ्यू और  12 राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित चर्चित फिल्मकार आनन्द पटवर्धन शामिल हुए थे। खास बात यह है कि क्यूबा के राजदूत परिवार के साथ पहुंचे थे। दिलचस्प बात यह है कि वेनेजुएला के एंबेडसर ने हमें एक फिल्म की सीडी गिफ्ट की थी।
 
त्रासदियों को कैमरे में किया था कैद

शाह आलम बताते हैं कि उस प्रदर्शनी को पांच साल होने को हैं। सुनील जाना हम सबके बीच प्रत्यक्ष तौर भले न हो लेकिन वे अपने बेहतरीन और ऐतिहासिक वर्क के लिए हमारे जेहन में हमेशा जिन्दा रहेंगे। तीस के दशक से 90 के दशक तक, साठ वर्ष तक वे फ़ोटोग्राफ़ी करते रहे। इन साठ वर्षों में उन्होंने आज़ादी के आंदोलन, किसान-मज़दूरों के संघर्षों, भारत के प्राचीन स्थापत्य से लेकर आज़ाद भारत के तीर्थ कहे जाने वाले उद्योगों, बाँधों, कल-कारखानों, रेलवे लाइनों तक के निर्माण को, राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-वैज्ञानिक शख्सियतों से लेकर देश के विभिन्न आदिवासी समुदायों, दंगों, अकाल, लाशों के ढेर, विद्रोह, विभाजन, विस्थापन से लेकर मनुष्य के श्रम को उन्होंने अपनी तस्वीरों में दर्ज किया।
 
झाँसी से शुरू होगी नई पहल

शाह आलम कहते हैं कि उनकी स्मृतियों को सहेजने के लिए एक नई पहल की गई है। चंबल में सुनील जाना फोटोग्राफी स्कूल की शुरुआत की जा रही है। इसकी शुरुआत ऐतिहासिक झाँसी किले से की जाएगी। कैमरे की नजर से चंबल में बिखरी खूबसूरती, विविधता और आकर्षण को कैद करने की कोशिश होगी। यह एक तरह से सुनील जाना को श्रद्धांजलि होगी।
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