बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण में सावधानी जरूरी, अन्यथा हो सकते हैं ये खतरे

बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण में सावधानी जरूरी, अन्यथा हो सकते हैं ये खतरे

BK Gupta | Publish: Sep, 07 2018 10:57:47 PM (IST) Jhansi, Uttar Pradesh, India

बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण में सावधानी जरूरी, अन्यथा हो सकते हैं ये खतरे

झांसी। अपर निदेशक की अध्यक्षता में जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन यानी कि बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट की मण्डल स्तरीय एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें अस्पतालों से निकलने वाले जैव चिकित्सा अपशिष्ट का सही से निस्तारण के संबंध में जानकारी दी गई।
चार तरह से होगा बंटवारा
बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रुल्स, 2016 और बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट (अमेंडमेंट) रुल्स, 2018 के अनुसार बायो मेडिकल वेस्ट को उनके विविधता के हिसाब से चार भागों में बांटकर उसका निस्तारण किया जाना है। इसके लिए चार तरह के कूड़ेदानों का प्रयोग करना हैं लाल, पीला, नीला, सफ़ेद। प्रदेश स्तर से आए पर्यावरण विशेषज्ञ ने बताया कि सौ प्रतिशत में मात्र 20 प्रतिशत ही जैव चिकित्सा अपशिष्ट होगा और उसमें भी 15 प्रतिशत ही संक्रामण पैदा करने वाला होगा। यदि कूड़े को उसकी विविधता के अनुसार अलग नहीं करेंगे तो वो 15 प्रतिशत संक्रमित अपशिष्ट बाकी साधारण अपशिष्ट में मिलकर उसको भी संक्रमित कर देगा। फिर उसका निस्तारण करना थोड़ा मुश्किल होगा। ऐसे में अपशिष्ट के पृथक्कीकरण का ध्यान रखना चाहिए।
सही जानकारी जरूरी
देखा गया हैं कि अभी भी अस्पतालों में जैव चिकित्सा अपशिष्ट का पृथक्कीकरण सही से नहीं हो पाता है। डॉक्टर और बाकी स्टाफ़ को लगता हैं कि यह काम सफाई कर्मचारियों का है लेकिन सफाई कर्मचारियों को इस बात की समझ ही नहीं होती कि कौन सा कूड़ा कहा फेंकना है। मण्डल में जैव चिकित्सा अपशिष्ट का निस्तारण करने के लिए एक कमेटी है जो समय-समय पर वह अपशिष्ट अस्पतालों से उठवाकर उसका निस्तारण करती है।
मेडिकल कॉलेज झांसी की जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन की नोडल डा॰ कनकने ने मेडिकल कालेज के बारे में बात करते हुये बताया कि उन्होंने हर एक वार्ड में एक महिला नर्स को इंचार्ज बनाया है कि वह ध्यान दे कि जैव चिकित्सा अपशिष्ट सही कूड़ेदान में डाले जाए। लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि कहीं किसी सफाई कर्मचारी को सफाई के दौरान कुछ मिला तो वो सीधे उसे जनरल कचरे में डाल देते हैं। बहुत बार उनको बताया भी गया लेकिन वो अलगाव नहीं कर पाते कि किसमें क्या डालना है? इसके लिए उनकी अलग से ट्रेनिंग करने के बारे में वह सोच रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ ने बताया कि अब से एक पोस्टर सभी कूड़े दानों के पास लगाना है कि किस कलर के कूड़ेदान में क्या डालना है?
डाक्टर्स भी लें जिम्मेदारी
अपर निदेशक डा॰ सुमन बाबू मिश्रा ने बताया कि कूड़ा कोई भी हो लेकिन वह निकलता तो हमारे ही जरिये हैं। ऐसे में उसका निस्तारण करने के लिए हमें ही आगे आना होगा। डॉक्टर भी अब अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें कि उनके यहां पर जैव चिकित्सा अपशिष्ट का सही से पृथक्कीकरण हो। इसमें अपर निदेशक के साथ संयुक्त निदेशक, मण्डल के सभी मुख्य चिकित्साधिकारी, अपर मुख्यचिकित्सा अधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, इंडियन मेडिकल एसोशिएट के अध्यक्ष, सभी ब्लॉक के मेडिकल अधिकारी इंचार्ज, जैव चिकित्सा प्रबंधन के नोडल अधिकारी, प्रदेश से आए पर्यावरण विशेषज्ञ, सिफ़प्सा के मण्डल प्रबन्धक आदि लोग मौजूद रहे। कार्यशाला का संचालन सिफ़प्सा के मण्डल प्रबन्धक आनंद चौबे के द्वारा किया गया।

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