न रहमतों का साया, न ममता का आंचल

भोपालगढ़ (जोधपुर ). दस माह की मासूम कुसुम मां-बाप का साया अभी तक स्पर्श में ही समझ पाई थी, उसकी तीन वर्षीय बड़ी बहन दीपिका भी थोड़ा-थोड़ा समझ ही रही थ

By: Manish Panwar

Published: 10 Mar 2018, 01:11 AM IST

भोपालगढ़ (जोधपुर ). दस माह की मासूम कुसुम मां-बाप का साया अभी तक स्पर्श में ही समझ पाई थी, उसकी तीन वर्षीय बड़ी बहन दीपिका भी थोड़ा-थोड़ा समझ ही रही थी कि दर्दनाक सड़क हादसे में उन्होंने अपने मां-बाप को खो दिया। अब तक इनके भरोसे अपना बुढ़ापा गुजार रहे बच्चियों के दादा चंदाराम मेघवाल पर अब इनके लालन-पोषण का भार आ गया है। बेटे-बहू की मौत से सदमे में आए चंदाराम को समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे बच्चियों का लालन-पोषण होगा, क्योंकि न तो कमाई है और न ही उनके बूढ़े शरीर में कमाने की ताकत बची है।

कस्बे के मेघवालों के मोहल्ले में रहने वाले तीस वर्षीय युवक ओमप्रकाश मेघवाल का जीवन भी कभी खुशियों भरा था। वह अपने परिवार में पत्नी और दो बेटियों तीन वर्षीय दीपिका और दस माह की कुसुम के साथ खुशी से अपनी मेहनत-मजदूरी के बल पर जैसे-तैसे खुशी के साथ जीवन बसर कर रहा था। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। होली के दिन शाम को अपनी पत्नी धापूदेवी व दोनों बच्चियों के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर अपने ससुराल केलावा गांव जाते समय रास्ते में खेड़ापा व बावड़ी कस्बे के बीच नेशनल हाईवे संख्या ६५ पर काल बनकर आए एक ट्रक ने पति-पत्नी दोनों को कुचल दिया। इस दर्दनाक हादसे में ओमप्रकाश व उसकी पत्नी धापूदेवी की तो मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। इसे कुदरत का करिश्मा कि कहेंगे कि दोनों अबोध बच्चियां इस हादसे में न केवल बच गई, बल्कि उनको खरोंच तक नहीं आई ।

भामाशाहों से आगे आने की अपील
दोनों अनाथ बच्चियों को सरकार की ओर से इनके लालन-पालन की व्यवस्था के लिए पालनहार योजना तथा सुकन्या समृद्धि योजना जैसी सरकारी योजनाओं के माध्यम से लाभान्वित करने का नियमानुसार प्रयास किया जाएगा। वहीं भामाशाहों, ग्रामीणों व स्वयंसेवी संगठनों को भी इनकी मदद में आगे आना चाहिए।

- डॉ. रामानंद शर्मा, उपखण्ड अधिकारी, भोपालगढ़

Manish Panwar Desk
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