लेफ्टिनेंट कर्नल रघुबीर सिंह ने 1965 की लड़ाई में विफल किया था पाक का नापाक ऑपरेशन

लेफ्टिनेंट कर्नल रघुबीर सिंह ने 1965 की लड़ाई में विफल किया था पाक का नापाक ऑपरेशन, मोर्चा बंदी वाली जगह का नाम है असल उत्तर, लोग आज भी चूमते हैं इस जगह को-

By: santosh

Updated: 03 Mar 2019, 11:55 AM IST

सितंबर 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर यकायक हमला बोल दिया। कुल 5-7 लाख ही सैनिक तब देश में सेवारत थे जिन्हें पश्चिमी सीमा पर तैनात किया गया। 18वीं राजपूताना राइफल्स बटालियन को पंजाब से सटी सीमा पर तैनाती का जिम्मा दिया गया। यह पैदल सेना (इनफैन्ट्री) थी। अभी 8 सितम्बर की सुबह हुई थी कि सामने पाक के 'पैटन टैंकों' की गरज सुनाई पड़ी।

 

जवानों ने तब तक खोदी जा चुकी खाइयों में छुपकर इन्तजार किया कि यह आक्रमण समाप्त हो जाए। लेफ्टिनेंट कर्नल रघुबीर सिंह इस पलटन का नेतृत्व कर रहे थे। इनकी तीनों कम्पनियां कुछ दूरी पर स्थित थीं और टैकों के गोलों से खुद को बचाने की उधेड़-बुन में लगीं थीं। इन्होंने रेंगते हुए, ऊपर से उड़ रहे तोपों के गोलों की परवाह न करते हुए, तीनों कम्पनियों से सम्पर्क साधा और टैंकों से निपटने के नुस्खे कम्पनी कमाण्डरों को बताए। मेजर रैंक के अधिकारी प्रत्येक कम्पनी को संचालित कर रहे थे और उनके तहत 100-115 सैनिक थे।

 

पाकिस्तान की गोलाबारी सारी रात चलती रही। इनके टैंक कमाण्डर यह नहीं भांप पाए कि इनके इर्द-गिर्द खाइयों में ही भारतीय सैनिक चुप्पी साधे बैठे थे और दुश्मन को मुगालते में धकेल रहे थे। धुएं और धुल के गुबार का फायदा उठाते हुए रघुबीर सिंह ने अपने सैनिकों के साथ दुश्मन के टैंकों के सामने 'एंटी टैंक माइंस' बिछा दीं। ताकि आगे बढ़ते हुए टैंकों का विध्वंस इन 'माइंसों' से होने लगे। ऐसा इसलिए जरूरी था कि पैदल सेना के पास टैंकों से लडऩे का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं था।

 

खाइयों में छुपे रघुबीर सिंह के लिए अगला निर्णय सूझा। वायरलैस से पीछे स्थित सेना अधिकारियों को हालात की गंभीरता से अवगत करा कर तुरन्त 'आर्टिलरी फायर' (गोला बारूद की टुकड़ी) मंगवाई ताकि दुश्मन के टैंकों से लोहा लिया जा सके। कोड के शब्द थे 'डीएफ. एस-ओ-एस. रैड, रैड रैड...' जब तक गुप्त सूचना पर भारतीय सेना कार्रवाई करती तब तक 9 सितम्बर की सुबह हो गई थी और 40 पैटन टैंक भारतीय सीमा में आग के गोले दागते हुए गिने जा चुके थे। रघुबीर सिंह विचित्र प्रश्न का सामना कर रहे थे कि यदि इन दुश्मनों को आज यहां नहीं खत्म किया तो ये एक दिन में चण्डीगढ़ तक पहुंच जाएंगे। यानी कि पंजाब का पतन?

 

आखिरी दांव रघुबीर ने दागा। 'रिकाइललैस एंटी टैंक गन' का शुभारंभ (या अन्तिम अवसर) किया गया। साथ ही अपने पास स्थित तमाम गोलियों को एक साथ ही बरसाना आरंभ किया। स्वयं ने 'लाइट मशीन गन' का इस्तेमाल कर दुश्मन को एक बारगी चौंका दिया। कहां से यकायक ऐसा जवाब आया? शाम होते-होते गिने गए। 22 पैटन टैंक ध्वस्त, 19 बी.एम.जी. टूटी पाई गईं और कई जीपें टुकड़ों में बिखरी मिलीं। पाकिस्तान का सबसे आक्रामक दाव फेल किया गया। राजपूताना राइफल्स के 5 जवान वीरगति को प्राप्त हुए और 29 बहादुर सैनिकों को गहन चोटें आई, इनमें रघुबीर सिंह भी सम्मिलित थे।

 

जिस स्थान पर यह मोर्चाबंदी हुई उसका नाम 'असल उत्तर' है। आज भी पंजाब की सीमा पर वहां लोग जमीन को चूम कर इस लड़ाई का स्मरण करते हैं। पंजाब यों बचाया जा सका 'असल उत्तर' से। इस उत्तर की प्रशंसा में ले. कर्नल रघुबीर सिंह को 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया जो उन्हें राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने प्रदान किया। टोंक जिले के सोडा गांव में 2 नवम्बर 1923 को जन्मे ब्रिगेडियर रघुबीर सिंह जयपुर में निवास कर रहे हैं। इन्हें और इन जैसे रणबांकुरों को पत्रिका का सलाम, बार-बार!

 

संकलन: हर्षवर्धन

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