scriptBhopal Singh took command in Chhachhars for six months | पाकिस्तान के छाछरों में भोपालसिंह ने छह माह तक संभाली थी राजस्थान पुलिस की कमान | Patrika News

पाकिस्तान के छाछरों में भोपालसिंह ने छह माह तक संभाली थी राजस्थान पुलिस की कमान

- बाड़मेर के सिलोर गांव के भोपालसिंह राजपुरोहित को दी गई थी थानेदार की जिम्मेदारी

जोधपुर

Published: December 07, 2021 07:01:00 pm

अविनाश केवलिया/जोधपुर। 1971 का युद्ध जब भारतीय सेना के साथ राजस्थान पुलिस ने भी अदम्य शौर्य दिखाया था। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के छाछरों को भारतीय जिला तक घोषित कर दिया। वहां पुलिस थाना खोला गया। छह माह तक वहां राजस्थान पुलिस के जांबाज अधिकारी व सिपाही तैनात रहे। यह शौर्यगाथा है उनकी कमान संभालने वाले बाड़मेर के सिलोर गांव के मूल निवासी भोपालसिंह राजपुरोहित की। उनके जीवन से जुड़े संस्करण उनके पुत्र व राजस्थान राज्य बीज निगम के पूर्व निदेशक मनोहरसिंह राजपुरोहित सिलोर ने साझा किए।
 पाकिस्तान के छाछरों में भोपालसिंह ने छह माह तक संभाली थी राजस्थान पुलिस की कमान
पाकिस्तान के छाछरों में भोपालसिंह ने छह माह तक संभाली थी राजस्थान पुलिस की कमान
भारतीय सेना की ओर से पश्चिमी सीमा पर विजय पताका फहराने के बाद बाड़मेर के तत्कालीन जिला कैलाशदान उज्जवल के आदेश पर छाछरों में राजस्थान पुलिस को तैनात कर दिया गया। ऐसी विषम परिस्थितियों में अधिकांश लोगों ने वहां ड्यूटी करने से इनकार कर दिया। लेकिन भोपालसिंह ने अपने कुछ साथियों के साथ वहां मोर्चा संभाला। किसी प्रकार का झगड़ा किए बिना उन्होंने वहां हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के जरिये छह माह का समय निकाला। इसके बाद जब शिमला समझौता हुआ तो जुलाई 1972 के समय वे अपनी टीम के साथ फिर भारत लौट आए। वे थानेदार के पद पर कार्यरत रहे। छाछरों में एकमात्र भारतीय थानेदार होने का गौरव भी उनके नाम है।
पत्नी बीमार फिर भी देशसेवा पहले
भोपालसिंह को जब पाकिस्तान के छाछरों में ड्यूटी के लिए भेजा जा रहा था। तब उनकी पत्नी जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में भर्ती थी। चिकित्सकों ने कहा उनको पत्नी के पास रहना जरूरी है। लेकिन उन्होंने कहा कि पत्नी का ख्याल तो आप मेडिकल टीम रख लेंगे, लेकिन मुझे मेरी ‘ मां ’ मेरे देश की सेवा का मौका मिला है, इसलिए जाना होगा।
बॉर्डर पार से आज भी मिलता है प्यार
राजपुरोहित जब करीब छह माह तक वहां रहे तो वहां हर कौम-जाति के लोगों की मदद की और उनके स्वभाव के कारण लोग उनके मुरीद हो गए। 1972 में शिमला समझौता हुआ और 1982 में वे सेवानिवृत्त हो गए। इसके बाद भी उनके लिए बॉर्डर पार से प्यार व पत्र प्राप्त होते रहे। उनके परिवार के पास आज भी पाकिस्तान से आए दर्जनों पत्र पड़े हैं।
मिला राष्ट्रति पदक

पाकिस्तान के छाछरों में थानेदार पद पर साहसिक कार्यों व देश-प्रेम को देखते हुए पुलिस विभाग की ओर से उनको राष्ट्रपति पुलिस पदक से तत्कालीन राज्यपाल सरदार जोगिंदर सिंह की ओर से सम्मानित किया गया। फरवरी 2002 में उनका निधन होने पर बॉर्डर पार व पश्चिमी राजस्थान के कई लोग उनकी शोक सभाओं में शामिल हुए।

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