सदियों पुराने चातुर्मास निमंत्रणों पत्रों में होता था नगर का चित्रण

जोधपुर के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में मौजूद है चातुर्मास पत्रों का अनूठा संग्रह

By: Nandkishor Sharma

Published: 29 Jun 2020, 06:59 PM IST

जोधपुर. सदियों पहले जब संचार साधनों का अभाव था तब वर्षाकाल के लिए जैन मुनियों, साधु-संतों को नगर में चातुर्मास व्यतीत करने के लिए भेजे जाने वाले निमंत्रण पत्रों में तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक का सचित्र वर्णन भी होता था। ऐसे ही 18 वीं शताब्दी के प्राचीन सचित्र चातुर्मास निमंत्रण पत्र जोधपुर के पीडब्ल्यूडी रोड स्थित प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में मौजूद है। चौमासा निमंत्रण पत्रों में नगर के समृद्ध लोगों की ओर से जैन मुनियों को चातुर्मास के लिए संदेश के साथ पत्र में नगर का सामाजिक, सांस्कृतिक वैभव चित्रांकित होता था। इतिहास एवं साहित्य की दृष्टि से बेमिसाल निमंत्रण पत्रों में चातुर्मास स्थलों के आसपास के धार्मिक स्थलों, जलाशयों, बाजार, लोगों की जीवन पद्धति एवं विभिन्न व्यवसायिक गतिविधियों का भी चित्रण किया जाता था।

मेवाड़ चित्रशैली के निमंत्रण पत्र
विक्रम संवत 1802 का एक 8.5 मीटर लंबा एवं 30 सेमी चौड़ा खरड़ानुमा ( स्क्रॉल) सचित्र चातुर्मास निमंत्रण पत्र है जिसमें भवन, हाथी, घोड़े, जैन साधु, बाजार, माता त्रिशला के 14 स्वप्न, मेले का दृश्य और श्रीनाथ मंदिर का सुंदर चित्रांकन है। मेवाड़ चित्रशैली के निमंत्रण पत्र को विनयसागर ने लाशुनाक्य नगर में चातुर्मास आराधाना के लिए कल्याण सूरि को प्रेषित किया था। इसी तरह जोधपुर के जैन संगठन की ओर से विक्रम संवत 1892 को सूरत में विराजित विजयदेव सूरि को प्रेषित चातुर्मास निमंत्रण में जोधपुर नगर का सांस्कृतिक चित्रण किया गया। राजा मानसिंह के शासन का उल्लेख भी है। विक्रम संवत 1880 में मेड़ता के शिवचंद ने गुजरात पालनपुर में विराजित मुनि विजेन्द्र सूरि को चौमासा करने के लिए आमंत्रण पत्र में सचित्र वर्णन किया था। चौमासा विज्ञप्ति पत्रों में सन 1942 बड़ौदा ग्रंथमाला से प्रकाशित एनसिएन्ट विज्ञप्ति पत्र में एक ऐसा भी संदर्भ मिलता है जिसमें अकबर के समकालीन चितेरे शालिवाहन की ओर से जहांगीर के फरमान के आंखों देखा चित्रण किया गया है। इसमें जैन चातुर्मास के महत्वपूर्ण पर्युषण पर्व पर पशुओं की हत्या पर प्रतिबंध लगाने का वर्णन चित्रित है।

राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान राजस्थान कला संस्कृति मंत्रालय के अधीन विगत 5 दशकों से हस्तलिखित ग्रंथों के संग्रह संरक्षण संपादन एवं प्रकाशन के उद्देश्यों की पूर्ति कर रहा है । यहां पर 12 वीं सदी से बीसवीं सदी के एक लाख 14 हजार हस्तलिखित ग्रंथों का संग्रह कागज कपड़ा भोजपत्र ताड़ पत्र चर्म पत्र आदि पर आधारित है । यह ग्रंथ ज्योतिष आयुर्वेद इतिहास पुराण दर्शन तंत्र मंत्र आदि 25 विषयों में विभक्त है । इनमें सदियों पुराने चित्रात्मक निमंत्रण पत्र की विषयवस्तु शोध अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण है।
भंवर लाल मेहरा, निदेशक राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर


जैन मुनियों यतियों अर्थात साधु समाज को नगर के समृद्ध लोगों की ओर से चातुर्मास व्यतीत करने के लिए जो निमंत्रण पत्र तैयार कर प्रेषित किए जाते थे वे विज्ञप्ति पत्र कहलाते हैं । दो प्रकार के विज्ञप्ति पत्र में एक खरड़ानुमा लिखे जाते थे। पत्र के मुख्य भाग पर विभिन्न चित्रांकन में चातुर्मास बिताने के लिए आचार्य से प्रार्थना और अच्छे कार्यों का वर्णन आदि का भी वर्णन मिलता है।
डॉ कमल किशोर सांखला (वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी) राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर

Nandkishor Sharma Desk
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