मूंगफली की फसल पर मंडराने लगा पीलिया का साया

मूंगफली की फसल पर मंडराने लगा पीलिया का साया
फलोदी के काली माली में पीलिया रोग से ग्रसित मूंगफली की फसल

Mahesh Soni | Updated: 12 Aug 2019, 10:42:28 AM (IST) Jodhpur, Jodhpur, Rajasthan, India

पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क
फलोदी. क्षेत्र में कृषि फार्मों पर बुवाई की गई मूंगफली की फसल पर पीलिया रोग का खतरा मंडराने लगा है। इससे क्षेत्र में कई जगहों पर मूंगफली की फसल पर पीले रंग का असर दिखने लगा है। मूंगफली में पीलिया रोग से बचाव के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र ने एडवाइजरी जारी करके किसानों को सतर्क रहने की अपील की है।

कृषि विज्ञान केन्द्र फलोदी के सस्य वैज्ञानिक डॉ. एम एम पूनिया ने बताया कि मूंगफली की फसल में पीलिया रोग आयरन (लोह) तत्व की कमी के कारण होता है। इसके लिए मिट्टी की जांच करवानी चाहिए। आयरन पौधों में क्लोरोफिल निर्माण के लिए आवश्यक है तथा यह अनेक एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कार्बोहाइड्रेट के निर्माण व नाइट्रोजन स्वांगीकरण में भाग लेता है। उन्होनें बताया कि इस बीमारी से प्रभावित खेत को आसानी से पहचाना जा सकता है। आयरन की कमी के लक्षण सर्वप्रथम पौधों की नई पत्तियों पर दिखते है तथा उपरी पत्तियां पीली पड़ जाती है। बाद में ये लक्षण पुरानी पत्तियों पर भी आ जाते है और सभी पत्तियां सूखने लग जाती है। उपाय नहीं किए जाने पर पत्तियां सफेद पीली व उन पर भूरे नक्रोरेटिक धब्बे बन जाते है। इससे प्रकाश संश्लेषण की दर में कमी होने से उपज कम हो जाती है।
मूंगफली में पीलिया रोग के निवारण के लिए ध्यान रखना चाहिए कि चूनेदार या क्षारीय मिट्टी में मूंगफली के पौधे नहीं लगाएं। जलनिकासी में सुधार व पानी आवश्यकतानुसार ही देना चाहिए। मृदा में आयरन की कमी दूर करने के लिए 5-10 किलोग्राम आयरन किलेट्स प्रति हैक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए। जिन खेतों में मूंगफली की फसल में पीलिया रोग होता है, वहां तीन वर्ष में एक बार बुवाई से पूर्व 250 किलो जिप्सम या भूमि परीक्षण के आधार पर हरा कसीस प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए। इसके अभाव में गंधक के तेजाब के 0.1 प्रतिशत घोल का फसल में फूल आने से पहले तथा फूल आने के बाद दूसरी बार छिड़काव करना चाहिए। पीलिया की रोकथाम के लिए बुवाई के 40-55 दिन पर फैरस सल्फेट का 0.5 प्रतिशत घोल बनाकर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए। (कासं)
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