मिट्टी-कीचड़ में फंसने के कारण ढूंढने में लगे 6 दिन

- झील में कम्प्रेसर की एयर से शव के जगह छोडऩे पर बिलोय में फंसने की आशंका
- नेवी के मार्कोस गोताखोरों के साथ सत्तर से अधिक गोताखोर छह दिन से कर रहे थे तलाश

By: Vikas Choudhary

Published: 13 Jan 2021, 12:21 AM IST

Jodhpur, Jodhpur, Rajasthan, India

जोधपुर.
देश की टॉप कमाण्डो यूनिट में शुमार 10 पैरा (स्पेशल फोर्सज) के कैप्टन उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद निवासी अंकित गुप्ता (28) पुत्र अशोक कुमार के तख्तसागर में लापता होकर 5 दिन तक न मिलना रहस्य बनता जा रहा था। अमूमन डूबने वाले व्यक्ति के शरीर में पानी भरने पर शव फूलकर हल्का होने पर 24 से 30 घंटे में शव सतह पर आ जाता है, लेकिन कैप्टन के मामले में एेसा नहीं हुआ। हादसे के 123 घंटे बाद छठें दिन कैप्टन के शव को बाहर निकालने वाले गोताखोरों की मानें तो झील के तल में मिट्टी, कीचड़ व काई जम चुकी है। झील के बीचों-बीच पानी में लापता होकर कैप्टन डूब गए थे। अचेत होने पर वो झील की गहराई में चले थे, जहां शव मिट्टी या कीचड़ में फंस गया था। जिसकी वजह से शव सतह पर नहीं आ पाया था।
सैन्य अधिकारियों के आग्रह एक स्थानीय व्यवसायी ने पत्थर खनन में प्रयुक्त होने वाली उच्च क्षमता वाली कम्प्रेसर मशीन उपलब्ध करवाई थी। एक हजार फुट से अधिक लम्बे पाइप वाली कम्प्रेसर मशीन से झील में एयर प्रेशर किया गया। शायद इसी वजह से कीचड़ में फंसा शव कुछ बाहर आया और बिलोय में फंस गया।

कमाण्डेंट व सैन्य अधिकारी-जवानों में मायूसी
सात जनवरी की दोपहर से राहत कार्य में जुटे सैन्य अधिकारी व जवानों के साथ सारे गोताखोरों ने कैप्टन के मिलने पर राहत की सांस तो ली, लेकिन जीवित बचा न पाने से मायूस भी थे। शव देख सभी उदास और दुखी हो गए। कैप्टन को बचा न पाने का सभी को मलाल है।

नियमित 18 घंटे सर्च, 6 घंटे में भी न चैन और न आराम
सेना ने गत सात जनवरी की दोपहर कैप्टन का सर्च अभियान शुरू किया था। जिसमें नेवी के मार्कोस, एनडीआरएफ व एसडीआरएफ, सेना, सिविल डिफेंस व मालवीय बंधु के गोताखोर शािमल थे। करीब 70 गोताखोर व 15 से अधिक बोट व नौकाओं की मदद ली गई थी। यह गोताखोर सर्द सुबह 6 बजे पानी में उतरते थे और अंधेरे के बावजूद रात 12 बजे तक सर्च करते थे। प्रतिदिन 18 घंटे रेस्क्यू किया जाता था। गोताखोर सिर्फ छह घंटे पानी से दूर रहते थे। कैप्टन न मिलने की वजह से आराम भी नहीं कर पाते थे।

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