Jodhpur: जोधपुर में ज्वालामुखी व समुद्री चट्टानों का मिलन

Jodhpur: जोधपुर में ज्वालामुखी व समुद्री चट्टानों का मिलन

Gajendra Singh Dahiya | Updated: 22 Jul 2019, 04:00:00 AM (IST) Jodhpur, Jodhpur, Rajasthan, India

- देश में विंध्याचल और हिमालय के अलावा जोधपुर में ही है ऐसा विषम विन्यास
- जोधपुर से देचू तक था समुद्र का किनारा, रहते थे अकशेरूकी जीव
- जिओ हेरिटेज दिवस विशेष

जोधपुर. जोधपुर में ज्वालामुखी के पास मिलने वाली आग्नेय चट्टान और समुद्र के पास मिलने वाली अवसादी चट्टानों का विषम विन्यास (अनकंफॉरमेटी) मिला है। मेहरानगढ़ किले में प्रवेश के बाद लिफ्ट के पास दोनों चट्टानों का इंटरफेस यानी आधी चट्टान आग्नेय है और आधी अवसादी। देखने में आग्नेय चट्टान धूली हुई व अवसादी मटमेली दिखती है लेकिन यह दो चट्टानों को मिलन स्थल है। इस तरह की चट्टानें राव जोधा पार्क, बिलाड़ा और बालेसर के पास कुई जोधा गांव में भी मिल रही हैं। पूरे विश्व में इस तरह के विन्यास आधा दर्जन के करीब ही हैं। भारत में जोधपुर के अलावा विंध्याचल पर्वत और हिमालय में देहरादून के पास क्रोल समूह में ऐसे विन्यास मिलते हैं।

जोधपुर में 780 मिलियन वर्ष पहले ज्वालामुखी हुआ करते थे। उस समय विंध्याचल पर्वत के ऊपरी भाग में समुद्र था, जिसे विंध्यन समुद्र कहते थे। जोधपुर, विंध्यन से एक पतली पट्टी के रूप में जुड़ा हुआ था। कालांतर में समुद्र का विस्तार जोधपुर तक हो गया। जोधपुर के सूरसागर, आगोलाई, बालेसर और देचू तक समुद्र का किनारा था। उस समय स्टारफिश जैसे अकशेरूकी जीव रहते थे, जिनके जीवाश्म आज भी क्षेत्र में मिलते हैं। जोधपुर के समुद्र को मारवाड़ समुद्र कहा गया, जिसका विस्तार पाकिस्तान के सिंध प्रांत तक हो गया था। यह कैंब्रियन काल यानी 680 से 542 करोड़ वर्ष पूर्व की घटना है।

समुद्र के कारण मिलता है छीतर का पत्थर
जोधपुर में प्री कैम्ब्रियन पीरियड में समुद्र होने के कारण यहां छीतर का पत्थर मिलता है जो बूंदी-कोटा से विंध्य पर्वतमाला तक जुड़ा हुआ है। इससे वैज्ञानिकों को भारत का भू विज्ञान समझने में मदद मिलती है। समुद्र की गहराई करीब 100 मीटर थी, जिसमें धीरे-धीरे अवसादी करण के साथ ही कशेरुकी जीवों का प्रवेश हुआ।


बेहतर जिओ आर्कियोलॉजी
‘जोधपुर, बाड़मेर में जालौर में स्थित मालाणी संरचना और ज्वालामुखी प्रमाण से भू विज्ञान के कई तथ्य समझने में मदद मिल रही है।
डॉ एसके वधावन, पूर्व महानिदेशक, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया

विश्व मे बहुत कम उदाहरण हैं
‘जोधपुर में जिस तरह कि भू संरचनाएं मिल रही है ऐसी संरचना विश्व में बहुत कम है। खुद मेहरानगढ़ किले के पूर्व की तरफ वेल्डेड टूफ और पश्चिम की तरफ लावा पत्थर है, जबकि हाथी कैनाल के पास बड़े ज्वालामुखी ब्रकेशिया मिले हैं।
डॉ सुरेश माथुर, विभागाध्यक्ष, भू-विज्ञान, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर

जिओ साइट के रूप में करेंगे विकसित
‘मेहरानगढ़ किले की लिफ्ट के पास दोनों चट्टानों का इंटरफेस है। पर्यटकों के लिए हमने वहां साइन बोर्ड लगाया है। अब हम मेहरानगढ़ को जिओ साइट के रूप में विकसित कर रहे हैं।
करणी सिंह, निदेशक, मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट

 

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