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प्रदेश की पुरालेखीय सम्पदाओं के भण्डार पर जम रही धूल की परतें

शोध और अनुसंधान के लिए केंद्र व राज्य सरकार नहीं दे रही है किसी तरह का कोई अनुदान

जोधपुर

Published: February 27, 2022 11:59:46 pm

जोधपुर. राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के रूपक प्रदेश के विभिन्न निजी शोध संस्थानों में मौजूद पुरालेखीय सम्पदा के भण्डार पर शोध के अभाव में साल दर साल धूल की परतें जमती जा रही है लेकिन सरकार से मिलने वाले अनुदान को एक दशक पूर्व बंद कर देने से पुरालेखीय सामग्री के डिजीटलाइजेशन जैसी आधुनिक संरक्षण विधियों के माध्यम से दीर्घकालिक संरक्षण का कार्य ठप पड़ा है। \Bलाखों की संख्या में मौजूद है ग्रंथ \B राजस्थान में कई ऐसी निजी संस्थाएं, मंदिर, मठ, पुराने ठिकानों, प्राचीन रामद्वारे हैं जहां लाखों की तादाद में पुरालेखीय सम्पदा के रूप में बहियां, हस्तलिखित व सचित्र ग्रन्थ एवं कई प्राचीन चित्रावलियां संरक्षित हैं, जो राजस्थानी, बृज, डिंगल, पिंगल, संस्कृत, फारसी, ऊर्दू, अरबी आदि भाषा में लिखे गए हैं। इन संस्थाओं में प्रमुख रूप से राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर (वर्तमान में मेहरानगढ़ म्युजि़यम ट्रस्ट एवं चौपासनी शिक्षा समिति, चौपासनी की ओर से संचालित); प्रताप शोध प्रतिष्ठान, उदयपुर (विद्या प्रचारिणी सभा की ओर से संचालित) एवं साहित्य संस्थान, उदयपुर (राजस्थान विद्यापीठ की ओर से संचालित) हैं। इन संस्थानों को एक दशक पूर्व तक कॉलेज िश्क्षा निदेशालय जयपुर से राजकीय अनुदान प्राप्त होता था, लेकिन राजस्थान सरकार ने राजस्थान स्वैच्छया ग्रामीण शिक्षा नियम, 2010 के तहत् अनुदानित संस्थाओं में अनुदानित पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को 2011 में सरकार में समायोजित कर लिया। इसके पश्चात् मार्च 2012 से राज्य सरकार ने अनुदानित संस्थाओं का अनुदान बंद कर दिया।
प्रदेश की पुरालेखीय सम्पदाओं के भण्डार पर जम रही धूल की परतें
प्रदेश की पुरालेखीय सम्पदाओं के भण्डार पर जम रही धूल की परतें
हो सकेगा दीर्घकालिक संरक्षण

राजकीय अनुदान से न केवल प्राचीन पाण्डुलिपियों, चित्रावलियों का संरक्षण हो पाएगा, बल्कि वर्तमान में पुरालेखीय सामग्री का डिजीटलाइजेशन जैसे आधुनिक संरक्षण विधियों के माध्यम से दीर्घकालिक संरक्षण का कार्य भी हो पाएगा और प्राचीन लिपियों के पठन-पाठन आदि के माध्यम से उनको जानने वालों का भी संरक्षण प्राप्त होगा। वर्तमान में संस्थान की ओर से विद्वानों एवं शोधार्थियों को निःशुल्क विभिन्न शोध कार्यों में सहायता भी दी जा रही है। वर्तमान में अनुदान बंद होने के पश्चात् ये संस्थाएं निजी स्तर पर संचालित हो रही हैं। जिस तरह से पुरालेखीय संस्थानों को राजस्थान सरकार की ओर से संचालित किया जा रहा है। उसी प्रकार सरकार की ओर से निजी संस्थानों को भी राजकीय अनुदान देकर जीवित रखा जाना चाहिए।
राष्ट्र की एक अमूल्य निधि है पुरा संपदा

निजी संस्थाओं में लाखों की संख्या में मौजूद राजस्थानी, बृज, डिंगल, पिंगल, संस्कृत, फारसी, ऊर्दू, अरबी आदि भाषा में लिखे ग्रंथ व प्राचीन पाण्डुलिपियों के डिजीटलाइजेशन, शोध के लिए यदि राज्य सरकार अथवा भारत सरकार से अनुदान मिलता है तो राष्ट्र की एक अमूल्य निधि के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। प्राचीन ग्रन्थों का समयानुसार प्रकाशन एवं पाण्डुलिपि पठन के लिए विशेषज्ञों की कार्यशालाएं आयोजित करना आदि कई ऐसे कार्य होने में मदद मिल सकती हैं जो कि राष्ट्र की एक अमूल्य निधि के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। -डॉ. विक्रम सिंह भाटी, सहायक निदेशक, राजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर।

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