जोधपुर में लावारिस मानसिक रोगियों के साथ हो रहा कुछ एेसा, जिसे जान हो जाएंगे रोंगटे खड़े

न्यायालय के आदेश और संभागीय आयुक्त के निर्देश केवल कागजों में दबकर रह गए।

By: Harshwardhan bhati

Published: 09 Dec 2017, 02:58 PM IST

जोधपुर . मानसिक रूप से बीमार लावारिस रोगियों को कानून सम्मत मिलने वाले उपचार और उनकी मृत्यु के बाद की जाने वाली कार्रवाई में संबंधित मातहत अधिकारी न्यायालय के निर्देशों की खुली अवहेलना कर रहे हैं। जोधपुर में मानसिक रोगियों के लगातार एेसे कई मामले सामने आने के बाद राजस्थान उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति राजस्थान उच्च न्यायालय ने फरवरी २०१७ में संभागीय आयुक्त को एसएन मेडिकल कॉलेज के अधीनस्थ सभी चिकित्सालयों में सभी तरह के लावारिस और मनोरोगियों के भर्ती होने पर उनके परिजनों, वारिसान को सूचना देने के लिए दैनिक समाचार पत्रों में नियमानुसार सूचना प्रकाशित करने के निर्देश की अनुपालना सुनिश्चित करने को कहा था। संभागीय आयुक्त ने डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक को मानसिक लावारिस रोगियों के अस्पताल में इलाज के दौरान सूचना प्रकाशन के आदेश दिए थे। लेकिन उन आदेशों की पालना नहीं हो रही है। न्यायालय के आदेश और संभागीय आयुक्त के निर्देश केवल कागजों में दबकर रह गए।


केस नम्बर १

 

जोधपुर की स्वयंसेवी संस्था अपना घर ने २९ नवम्बर को रेलवे स्टेशन के बाहर एक लावारिस को उठाकर आश्रम में भर्ती कर लिया। बीमार लावारिस को ना तो अस्पताल लाने की जरूरत समझी और ना ही उसकी जानकारी समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाई। उस लावारिस व्यक्ति की ४ दिसम्बर को तबीयत बिगडऩे पर उसे एमडीएम अस्पताल लाकर भर्ती करवा दिया गया। हाथ पर नाम लिखे होने के बावजूद उसे नजर अंदाज कर नया काल्पनिक नामकरण श्याम कर दिया गया। उसकी मौत होने के बाद बिना पोस्टमार्टम किए दाह संस्कार करवा दिया गया। उसके डीएनए और विसरा तक भी सुरक्षित नहीं रखे गए। उस अज्ञात लावारिस के परिजनों के लिए भविष्य में भी पहचान हमेशा के लिए खत्म हो गई।


केस नम्बर २

 

बाड़मेर के रेलवे स्टेशन पर बीमार अवस्था में मिली ३५ वर्षीय मानसिक विक्षिप्त महिला को बाड़मेर के राजकीय चिकित्सालय से रेलवे पुलिस थाना अधिकारी ने २८ अक्टूबर २०१७ को एमडीएम रेफर किया गया। उसके बाद उस महिला को ना तो उचित चिकित्सा मिली और ना ही किसी तरह की कोई सार संभाल हुई। नतीजतन ६ दिसम्बर को उसने दम तोड़ दिया। मृत्यु के तीन बाद भी मोर्चरी में रखी उस महिला के बारे में समाचार पत्रों में कोई फोटो अथवा जानकारी प्रकाशित नहीं की गई है।


केस नंबर ३

 

मुन्ना नाम का एक लावारिस व्यक्ति ट्रोमा आब्जर्वेशन वार्ड में इन दिनों उपचाराधीन है। ओडि़सा के मूल निवासी मुन्ना की एक दुर्घटना के दौरान पांव पूरी तरह फ्रेक्चर है। उसे अभी तक वार्ड में एडमिट नहीं किया गया है। जबकि महात्मा गांधी अस्पताल में २० बेड का आर्थोपेडिक विभाग में एक पुनर्वास केन्द्र है, जहां मुन्ना जैसे लावारिस मरीजों की देखभाल हो सकती है, जबकि संबंधित विभाग इसे पूर्व की भांति स्वयंसेवी संस्थाओं को सौंपने को प्रयासरत है।

 


भटकते रहते हैं परिजन, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिलती

 

समूचे मारवाड़ में किसी परिवार का सदस्य बीमार अथवा मानसिक रूप में परेशान होकर अकेला ही किसी राजकीय अस्पताल में पहुंच जाता है अथवा पहुंचा दिया जाता है तो उसका सिर्फ भगवान ही मालिक है। संभाग के सबसे बड़े अस्पताल एमडीएम की पूछताछ खिड़की पर उसे जवाब मिलता है कि यहां केवल मोर्चरी में लाए जाने वाले लोगों की सूचना रहती है और यदि जानकारी चाहिए तो पुलिस चौकी में जाए। पुलिस चौकी से जवाब मिलता है कि उन्हें केवल अस्पताल में भर्ती रोगी के बारे में सूचना दी जाती है। यदि मरीज आकर चला गया तो उसकी जानकारी ट्रोमा सेन्टर से प्राप्त करे। ट्रोमा सेन्टर में मरीज की जानकारी चाहने पर जवाब दिया जाता है कि आप भामाशाह खिड़की पर चले जाए, वहां आपको जानकारी मिलेगी। भामाशाह खिड़की पर जवाब मिलता है कि हमारे पास लावारिस का कोई रिकार्ड नहीं, लेकिन प्रशासनिक शाखा से पता चल सकता है। प्रशासनिक शाखा में जवाब मिलता है कि हमारे पास सूचना उपलब्ध रहती है। यदि उपचाराधीन लावारिस मरीज चला जाता है तो वह सूचना उपलब्ध नहीं है। क्यों कि उसे कभी हड्डी वार्ड, कभी आईसीयू, कभी न्यूरो तो कभी मानसिक रोग विभाग में भिजवा दिया जाता है। एेसे में लावारिस मरीज के बारे जानकारी मिलना मुश्किल है। कई परिजन तो इसी तरह अस्पताल में भटकने के बाद मरीज की मौत होने पर रोते पहुंचकर शव को ले जाते हुए देखे जा चुके हैं।

 

विभागों में नहीं तालमेल

 

मरीज के भर्ती होने के दौरान एक निश्चित स्थान पर प्रथम रजिस्टर्ड की सुविधा नहीं पुलिस को फोटो सहित सूचना देने का अभाव होने से जांच में कमी, मरीज के परिजनों को ढूंढने में दिक्कत, कानूनी सहायता भी नहीं मिल पाती है। जबकि मेडिकल कॉलेज में इसके लिए बाकायदा फोटोग्राफर का पद है और उस पर कार्यरत है। मानसिक रूप से बीमार रोगी बोलने में सक्षम नहीं होने पर भी उसे लावारिस और बेघर मानना ,लावारिस मरीज के साथ कोई सहायक नहीं होने पर चले जाना अथवा संस्थानों को बुलाकर मरीज सौंप देना एेसी कई समस्याओं को दूर करने की आवश्यकता है।


एेसे मामलों में समाचार पत्रों का सहयोग जरूरी

 

मेंटल अपलिफ्टमेंट नीड सोसायटी 'मनÓ की ओर से लावारिस व अज्ञात लोगों को संरक्षण उपचार तथा पुनर्वास के लिए हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति जिला विधिक समितियों को तथा जिला प्रशासन व संबंधित पुलिस व जिला प्रशासन के अधिकारियों को समय समय पर जानकारी के साथ इस बाबत कार्रवाई का अनुरोध भी किया जा रहा है। विभागों का आपसी सांमजस्य नहीं होने से परेशानी हो रही है। लावारिस और मानसिक विक्षिप्त मरीजों की फोटो को समाचार पत्रों के साथ सोशल मीडिया को उपयोग जरूरी है।


योगेश लोहिया, सचिव, मन सोसायटी, जोधपुर

 

यह है न्यायालय आदेश

 

राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के उपसचिव धीरज शर्मा ने महानिरीक्षक पुलिस जोधपुर रेंज, पुलिस कमिश्नर जोधपुर महानगर, रेलवे पुलिस अधीक्षक को जारी निर्देश में कहा कि मानसिक विकृतचित्त व्यक्तियों के लावारिस अवस्था में पाए जाने अथवा पूरे प्रदेश में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जंजीरों से बांध कर रखने की सूचना मिलने पर उन्हें बंधनमुक्त करवाकर संरक्षण में लेकर इलाज के लिए राजकीय अस्पताल जहां भी व्यवस्था हो सुपुर्द करना आवश्यक है। निर्देशानुसार संबंधित मातहत अधिकारियों को मेंटल हैल्थ केयर एक्ट २०१७ के चेप्टर १३ (रेस्पोंसबिलिटी ऑफ अदर एजेंसीस) के तहत संबंधित क्षेत्रों के पुलिस व संबंधित अधिकारियों को विकृत लावारिस अवस्था में घूमते पाए जाने की सूचना मिलने पर संरक्षण में लेकर इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए। विधिक सेवा समिति या विधिक सेवा प्राधिकरण अथवा किसी भी माध्यम से मिलने पर उन्हें बंधनमुक्त कर संरक्षण में लेकर इलाज के लिए अस्पताल सुपुर्द करना चाहिए।

Harshwardhan bhati Desk
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