जोधपुर.

चुनावी खुमार चरम पर है। गांवों और शहरों के जनप्रतिनिधि टिकट लेने या किसी को दिलाने के लिए जयपुर से दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं। किसी तरह टिकट का जुगाड़ हो जाए, मतदाताओं को रिझाने का काम तो बाद में ही होगा। इस भागमभाग में नेताओं को फुर्सत नहीं है। किसानों की कहीं सुनवाई नहीं हो रही और मवेशी पानी की तलाश में गांव की गलियों में घूम रहे हैं ।


मानसून के दगा देने से जिले की आधा दर्जन से अधिक पंचायत समितियों की दर्जनों ग्राम पंचायतों में फसलें तो चौपट हुई ही, नाडी-तालाब भी रीते रह गए। मार्च-अप्रेल तक भरे रहने वाले तालाब अभी से सूखे पड़े हैं। इसका सबसे बुरा असर ऐसे मवेशियों पर पड़ा है जिन्होंने दूध देना बंद कर दिया। ऐसी गायों को किसानों ने खुले में चरने छोड़ दिया है। ये गायें और हजारों नंदी (सांड) गांव के गलियारों में यहां-वहां मुंह मारते फिर रहे हैं।


हर गांव में 8-10 आवारा सांड

जिले में 466 ग्राम पंचायतें और करीब एक हजार 870 गांव हैं। पशु पालन विभाग का मोटा अनुमान है कि इन गांवों में करीब दस हजार आवारा सांड घूम रहे हैं। विभाग के अनुमान के हिसाब से ही हर गांव में 6-7 सांड हैं।

लेकिन जोधपुर तहसील की दर्जनों ग्राम पंचायतों के सरपंचों का कहना है कि हर गांव में दस से बीस सांड उत्पात मचा रहे हैं। मण्डोर पंचायत समिति के पूर्व प्रधान रुगाराम चौधरी और खातियासनी सरपंच प्रतिनिधि भीकाराम छाबा के अनुसार जोधपुर शहर से बड़ी तादाद में गायें और नंदी गांवों के आसपास छोड़ दिए हैं।

डांगियावास बाइपास से डांगियावास थाने और माध्यमिक स्कूल के नजदीक जोधपुर-जयपुर हाइवे के दोनों तरफ बड़ी संख्या में मवेशियों का जमावड़ा रहता है। इनसे सडक़ हादसे होते हैं और स्कूली बच्चों को भी खतरा रहता है।

इनका कहना है कि आवारा सांडों को ‘बधिया’ कर दिया जाए। लेकिन पशुपालन विभाग के पास सांडों को पकडऩे के संसाधन नहीं हैं। गांव के लोग सांडों को पकड़ कर एक जगह इक_ा कर ले तो विभाग शिविर लगाकर इनका ‘बधियाकरण’ कर सकता है।

हर दिन दर्जनों वन्यजीवों की मौत

जिले के वन्यजीव बहुल क्षेत्र में भी पानी का विकट संकट है। प्यास के मारे हिरण सहित अन्य जीव गांवों का रुख कर रहे हैं। विश्नोई टाइगर्स वन्य एवं पर्यावरण संस्था के प्रदेशाध्यक्ष रामपाल भवाद के अनुसार अब तक वन्यजीव बहुल क्षेत्र में कहीं भी सरकारी स्तर पर पानी का इंतजाम नहीं किया गया है।

कई गांवों में लोग चंदा कर या अपने स्तर पर वन्यजीवों के लिए पानी का जुगाड़ रहे हैं, लेकिन ये ‘ऊंट के मुंह में जीरे’ के समान हैं। जिले की लूणी, मण्डोर और बावड़ी तहसील और बालेसर क्षेत्र में पानी की कमी के कारण हर दिन आठ-दस वन्य जीव रेत में फंसने, कुत्तों के हमले या रोड एक्सीडेंट में मारे जा रहे हैं।

समस्या का एक पहलू यह है कि गांवों में मवेशी सडक़ के किनारे खड़े रहते हैं। इनसे कई बार हादसे होते हैं। परिवहन विभाग के अनुसार चौदह प्रतिशत सडक़ हादसे ‘अन्य कारणों’ से होते हैं। इनमें आवारा मवेशियों, वन्यजीवों की वजह से होने वाले हादसे भी शामिल हैं।

यहां भी हालात बदतर

जोधपुर शहर में बासनी पुलिस स्टेशन से लेकर मैन सालावास रोड, सांगरिया बाइपास, सांगरिया फांटा क्षेत्र में आवारा सांडों का आतंक है। इनके झगड़े की वजह से राह चलते लोग गंभीर घायल हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि नगरनिगम की टीम शहर से पकड़े गए आवारा मवेशी इस क्षेत्र में छोड़ जाती है। एक अनुमान के अनुसार क्षेत्र में करीब 300 आवारा सांड हैं।

 

ग्राम पंचायतें सांड पकड़े तो कर सकते हैं नसबंदी

‘यह सही है कि जिले में करीब दस-बारह हजार सांड (नंदी) गांवों में घूम रहे हैं। अगर कोई ग्राम पंचायत इन्हें पकड़ कर विभाग से आग्रह करे तो पशुपालन विभाग सांडों की नसबंदी करा सकता है। विभाग के पास सांड पकडऩे की व्यवस्था नहीं है।
डॉ. दशरथसिंह, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग, जोधपुर

 

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