अब नहीं होती है वैसी रम्मत

अब नहीं होती है वैसी रम्मत
रम्मत

27 मार्च को विश्व थियेटर दिवस पर विशेष

 

जोधपुर . मारवाड़ के एक बड़े हिस्से में नब्बे के दशक तक गली-मोहल्लों की मंनोरंजन की दुनिया पर राज करने वाली लोकनाट्य शैली 'रम्मत' पर टीवी के धारावाहिकों ने प्रतिकूल असर डाला और रही-सही कसर इंटरनेट क्रांति ने पूरी कर दी है। आज 'रम्मत' का आयोजन यदा-कदा और इक्का-दुक्का कार्यक्रमों में सिमट गया है, वह भी केवल इसलिए कि इस शैली को बचाए रखना है, वरना भीड़ जुटाना तो रम्मतों के बस का नहीं रहा है। अभिनय की दुनिया चिंतित है कि कहीं लुप्त न हो यह शैली। पुराने कलाकार अपने खर्चे पर इसी सोच के साथ युवाओं को इस विधा से रुबरु करवा रहे है।

क्या है 'रम्मत'-

राजस्थानी भाषामें खेलने को रमणा कहते हेै। 'रम्मत' शब्द इसी का अपभ्रंश है। रम्मत कब से शुरू हुई इसका कोई प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। मगर एक अनुमान के अनुसार 18वीं सदी के अंत तक और 19वीं सदी के शुरू के बीच इसका उद्भव काल माना जा सकता है। बीकानेरजैसलमेर क्षेत्र में होली, सावन आदि अवसरों पर होने वाली लोक काव्य प्रतियोगिताओं से ही 'रम्मत' लोकनाट्य का उद्भव माना जाता है। जिसमें कुछ लोक कवियों ने राजस्थान के सुविख्यात लोकनायकों एवं महापुरूषों के जीवन पर आधारित काव्य व ऐतिहासिक-पौराणिक चरित्रों पर रचनाएं की। इन रचनाओं को जब रंगमंच पर मंचित किया गया, तो वे लोकनाट्य 'रम्मत' के रूप में प्रसिद्ध हुई। रम्मत की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उसकी साहित्यिकता है। वाद्यवादक व संगत करने वाले कलाकार रम्मत में स्वयं मनोरंजन का विशेष साधन बन जाते हैं और लोक समाज में इस वाजिन्दों साजियों की बहुत इज्जत होती है। रम्मत के शेष तत्व शेखावटी ख्याल से मेल खाते हैं। फर्क इतना ही रहता है कि जहां शेखावटी ख्याल पेशेवर ख्याल की गिनती में आ गए हैं, रम्मत सामुदायिक और लोकनाट्य का ही रुप लिए रही।
क्रांति का भाव भरा जैसलमेर ने

जैसलमेर रम्मत का एक बड़ा केन्द्र माना जाता रहा है। यहां के तेज कवि का नाम रम्मत कलाकार बड़े अदब से लेते है। तेज कवि ने रम्मत में मनोरंजन के साथ सामाजिक क्रांति का रंग भी भरा था। सन् 1938 में जन्मे इस कवि ने रम्मत का अखाड़ा श्रीकृष्ण कम्पनी के नाम से चालू किया। सन् 1943 में उन्होंने 'स्वतंत्र बावनी' की रचना की और उसे महात्मा गांधी को भेंट कर दी। ब्रिटिश सरकार ने इस पर निगरानी रखी और उनकी गिरफ्तारी का वारण्ट जारी कर दिया। जब तेज कवि को वारण्ट की सूचना मिली, वह पुलिस कमिश्नर के घर गए और रम्मत के अंदाज में अपनी ओजस्वी वाणी मे कहा
'कमिश्नर खोल दरवाजा, हमें भी जेल जाना है,
हिन्द तेरा है न तेरे बाप का
हमारी मातृभूमि पर लगाया बन्दीखाना है।'

तेज कवि (जैसलमेरी) के साथ मनीराम व्यास, तुलसी राम, फागू महाराज और सुआ महाराज रम्मत के कलाकारों को बड़े नामों में शामिल रहे है। रम्मत के विख्यात खिलाडिय़ों में स्वर्गीय रामगोपाल जी मेहता, साईं सेवग, गंगादास सेवग, सूरज काना सेनग, जीतमल और गीड़ोजी। ये सभी बीकाने के हैं। गीडोजी अपने समय के विख्यात नगाड़ावादक रहे हैं। बीकानेर के अलावा रम्मतें पोकरण, फलौदी, जैसलमेर और आस-पड़ोस के क्षेत्र में खेली जाती हैं। इन रम्मतों में जिन्होंने बहुत लोक ख्याति अर्जित की है वे हैं - रम्मत पूरन भक्त की, मोरहवज की, डूंगजी जवाहर जी की, राजा हरिशचन्द्र और गोपीचन्द भरथरी की।

रम्मत व वाद्ययंत्र-
रम्मत शुरु होने से पहले रम्मत के मुख्य कलाकार मंच पर ही आकर बैठ जाते हैं, ताकि हरेक दर्शक उन्हें अपनी वेशभूषा और मेक-अप में देख सके। संवाद विशेष गायकों द्वारा गाए जाते हैं, जो मंच पर ही बैठे होते हैं। और मुख्य चरित्र उन गायकों द्वारा गाये जाने वाले संवादों को नृत्य और अभिनय करते हुए स्वयं भी बोलते जाते हैं। रम्मत में मुख्य वाद्य नगाड़ा तथा ढोलक होते हैं। कोई रंगमंचीय साज-सज्जा नहीं होती। मंच का धरातल थोड़ा-सा ऊँचा बनाया जाता है। जो मुख्य गीत गाये जाते हैं उनका संबंध चौमासा - वर्षा ॠतु का वर्णन, लावणी - देवी-देवताओं की पूजा और गणपति वंदना से रहा है। रम्मत शुरु होने से पहले रामदेवजी का भजन गाया जाता है।

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