कैंसर पीडि़त वृद्धा पर टूटा दुखों का पहाड़, सिलिकोसिस की बीमारी ने पहले पति फिर दो जवान बेटों को छीना

- इलाज के लिए गहने व जमीन तक बेच डाली
- अब पिछले चार वर्ष से सरकारी सहायता के लिए वृद्धा काट रही चक्कर

By: Jay Kumar

Published: 11 Jul 2020, 08:30 AM IST

Jodhpur, Jodhpur, Rajasthan, India

ओम टेलर/जोधपुर. सिलिकोसिस ने पहले पति फिर मेरे दो जवान बेटों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। उनका इलाज करवाने के जमीन व गहने तक बेचे लेकिन उन्हें नहीं बचा सकी। दोनों बेटों की अकाल मौत ने मेरी बूढ़ी कमर ही तोड़ दी। सिलिकोसिस बीमारी से मरने वाले लोगों के आश्रितों को मिलने वाली सहायता राशि के लिए पिछले चार-पांच वर्ष में सरकारी कार्यालय के इतने चक्कर काटे की चप्पल घीस गए लेकिन जिम्मेदारों का दिल नहीं पिघला। ऐसे में आज मुझ वृद्धा को दो वक्त का भोजन भी दूसरों के भरोसे नसीब हो रहा है। सरकारी सहातया राशि मिले तो मुझ वृद्धा का कुछ आराम मिले।

यह दुखभरी कहानी है सोढ़ों की ढाणी वार्ड संख्या दो निवासी 63 वर्षीय शांतिदेवी पत्नी मिश्रीलाल की। पहले पति मिश्रीलाल की सिलिकोसिस से मौत हो गई। उसके बाद बेटे प्रकाश की 11 जून 2016 से सिलिकोसिस बीमारी से मौत हो गई। उसके गम से अभी उभरी ही नहीं थी कि दूसरे बेटे नरेश की भी 24 जून 2018 को सिलिकोसिस के कारण मौत हो गई। सरकार की ओर से सिलिकोसिस बीमारी से मरने वाले लोगों के आश्रितों को तीन लाख रुपए की सहायता राशि दी जाती है लेकिन वृद्धा शांतिदेवी पिछले करीब चार वर्ष से अधिक समय से सरकारी कार्यालय के चक्कर काट परेशान हो रही है लेकिन उसे अभी तक सहायता राशि नहीं दी गई। ऐसे में उसे घर खर्च चलाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

सिलिकोसिस व कैंसर ने छीना परिवार
पति मिश्रीलाल, बेटे प्रकाश व नरेश की सिलिकोसिस से तो बेटे कैलाश की कैंसर के कारण अकाल मौत होने से वृद्धा शांतिदेवी पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वृद्धा ने बताया कि वह खुद कैंसर पीडि़त है। इलाज चल रहा है। दो जवान बेटों को सिलिकोसिस के कारण खोना पड़ा लेकिन जिम्मेदार है कि उन्हें सरकारी सहायता से महरूम रख रहे है। सहायता राशि मिले तो बुढ़ापे में घर खर्च चलाने में आसानी रहे। वर्तमान में स्थिति यह है कि दो वक्त का भोजन भी दूसरों की सहायता से नसीब हो रहा है।

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