#सेहत सुधारो सरकार: बीमार जोधपुरी अस्पताल, ट्रोमा सेंटर के अभाव में कहीं टूट रहा दम तो कहीं हो रहे और बीमार

Abhishek Bissa

Publish: Sep, 16 2017 03:48:28 (IST)

Jodhpur, Rajasthan, India
#सेहत सुधारो सरकार: बीमार जोधपुरी अस्पताल, ट्रोमा सेंटर के अभाव में कहीं टूट रहा दम तो कहीं हो रहे और बीमार

कहीं ट्रोमा सेंटर नहीं होने से घायल दम तोड़ते हैं, तो कहीं उपचार को आए मरीज ठीक होने की बजाय बीमारी ले जाते हैं साथ

 

प्रदेश का दूसरा बड़ा शहर जोधपुर महानगर है। यहां चिकित्सा सुविधा के लिए एम्स और मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े संस्थान हैं। लेकिन ये शहर की विडंबना है कि आज भी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अस्पताल मरीजों को उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा देने में फिसड्डी है। जोधपुर जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में कहीं चिकित्सक पूरे नहीं है तो कहीं बिल्डिंग का ढांचा सही नहीं है। दूसरों की सेहत सुधारने वाले ये अस्पताल खुद बीमार है। अस्पतालों की अव्यवस्थाओं की आवाज जिले के स्वास्थ्य अधिकारी से लेकर प्रदेश अधिकारी तक जाती है, लेकिन कोई सुध नहीं लेता। इन अस्पतालों में स्टाफ के टोटे के साथ कई जांच के समुचित उपकरण तक नहीं है। इसके अलावा अस्पतालों के अंदर और बाहर गंदगी फैली हुई। यहां से मरीज स्वस्थ होने की बजाय दूसरी बीमारियां घर ले जाता है।

 

पहला महिला चिकित्सालय भी गंभीर 'बीमार'


भीतरी शहर के जूनी मंडी स्थित जोधपुर का पहला राजकीय जसवंत महिला ह्यूसन चिकित्सालय वर्तमान में बिल्डिंग जर्जर होने के चलते बीमार नजर आता है। यहां बारिश की सीजन में स्टाफ और मरीज आने से डरते हैं, क्योंकि बिल्डिंग जर्जर अवस्था में होने से स्टाफ को हादसे का भय सताता रहता है। अस्पताल में कई सामान कबाड़ की तरह पड़े है। दीवारों पर जाले लगे हुए है। शौचालय की हालत ऐसी है कि स्टाफ भी इसका इस्तेमाल नहीं करता। अस्पताल की लैब भी दयनीय स्थिति में है। शिकायत यह भी है कि यहां निविदा पर लगे लैब टैक्निशियन को भुगतान नहीं मिल रहा। मौजूद चिकित्सा अधिकारी डॉ. तारा व्यास के मुताबिक पानी का कनेक्शन नहीं है। अस्पताल के प्रभारी डिप्टी सीएमएचओ पद पर भी अतिरिक्त सेवाएं दे रहे हंै। अस्पताल में स्वीपर का पद भी खाली पड़ा है।

 

नाम प्रसूति चिकित्सालय, प्रसव होते नहीं

शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र नवचौकिया डिस्पेंसरी का नाम राजकीय जड़ाव व्यास स्मृति राजकीय प्रसूति गृह है। मजे की बात यह है कि यहां आज तक दो से चार प्रसव हुए। उसके बाद कोई प्रसव सुविधा नहीं हुई। अस्पताल की ओपीडी इस साल अभी तक 50 हजार के पार हो चुकी है। क्षेत्रवासी के बाशिंदों की इच्छा है कि अस्पताल क्रमोन्नत होकर सैटेलाइट बने, जबकि सरकार ने महज यहां दो डॉक्टर लगा रखे हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर भी मरीजों को दिखाने में घंटे लग जाते है। इसके बाद मरीज पंजीयन व नि:शुल्क दवा के लिए कतार में लगता है। इन अव्यवस्थाओं से क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी अनजान बने बैठे हैं।

पहुंचने से पहले ही घायल तोड़ देते हैं दम

जिला बनने की ओर अग्रसर फलोदी नेशनल हाइवे-15, मेगा हाइवे, स्टेट हाइवे से जुड़ा है, लेकिन हादसों में घायलों की जान बचाने के लिए यहां ट्रोमा सेंटर नहीं होने से घायल जोधपुर रैफर होते समय बीच राह में ही दम तोड़ देते है। चिकित्सालय की 100 से 150 शैय्याओं में क्रमोन्नति की प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के करीब 3 साल बाद भी वित्तीय स्वीकृति नहीं मिलने से मरीजों को उच्च स्तरीय इलाज नहीं मिल पा रहा। अस्पताल का प्रतिमाह सफाई का बजट 30 हजार रुपए है, जो ऊंट के मुंह मे जीरा के समान है। ऐसे में अस्पताल की साफ-सफाई व्यवस्था अक्सर रामभरोसे रहती है।

क्रमोन्नत के चार साल बाद भी पीएचसी जैसे हालात

लोहावट कस्बे में स्थित राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के क्रमोन्नत होने के चार साल बाद भी यहां पर सामुदायिक अस्पताल जैसी सुविधाएं नहीं बढी है। सुविधाओं के अभाव में रोगियों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इलाज के लिए मरीज इधर-उधर भटकने को मजबूर है। लोहावट में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पिछले करीब 50-55 सालों से संचालित हो रहा है। सितम्बर 2013 में इसे क्रमोन्नत कर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बनाया गया। मगर क्रमोन्नत के बाद भी अस्पताल में आज भी पुराने पीएचसी के हालात बने हुए है। अस्पताल में क्रमोन्नति के बाद चिकित्सकों संख्या बढ़ी है, लेकिन अस्पताल में बैड, ऑपरेशन थियेटर, ईसीजी, सीबीसी मशीन, एक्स-रे, आंख, कान, नाक, गला, एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ, सुविधायुक्त लेबर रुम, भवन, बडे ऑक्सीजन सिलेंडर आदि भी सुविधाएं नहीं है। वर्तमान में चिकित्सालय में करीब 200-225 मरीज प्रतिदिन इलाज के लिए आते हैं, लेकिन सुविधाओं की कमी के चलते ग्रामीणों को इलाज के लिए 110 किलोमीटर दूर जोधपुर सहित अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है। इससे मरीजों को समय एवं आर्थिक रुप से भी परेशानी उठानी पड़ रही है।

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