video विश्व रंगमंच दिवस : जिंदगी एक रंगमंच है और हम सब उसकी कठपुतलियां

MI Zahir

Updated: 27 Mar 2018, 01:49:59 PM (IST)

Jodhpur, Rajasthan, India

जोधपुर .

पुष्पा..मुझसे ये आंसू नहीं देखे जाते (अमर प्रेम).......

बाबू मोशाय..जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है. उसे ना तो आप बदल सकते हैं नाम मैं, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर ऊपरवाले के हाथ में बंधी है.......

जिंदगी एक रंगमंच है और हम सब उसकी कठपुतलियां। ऊपर वाला कब किसकी डोर खींच ले कुछ पता नहीं। शेक्सपियर के भाव कथन को फिल्म आनंद में राजेश खन्ना पर फिल्माया गया यह डायलॉग रंगकर्म के लिए प्रेरक और आदर्श वाक्य बन गया है। विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च के दिन यह और भी प्रासंगिक हो उठता है।

जोधपुर रंगमंच का गढ़

जोधपुर शुरू से ही रंगमंच का गढ़ रहा है। इस शहर ने फिल्मी दुनिया और रंगमंच को महिपाल, सÓजन और ओमशिवपुरी जैसे फनकार दिए हैं। जहां महिपाल ने फिल्मों में श्रीराम के पात्र को जीवंत किया। वहीं स"ान ने नाट्य शास्त्र के नौ रस अपनी अदाकारी से खूबसूरती के साथ साकार किए। वहीं आेमशिवपुरी ने तो रंगकर्म के साथ-साथ कई हिट फिल्मों का इतिहास बनाया। महिपाल जहां सरदारपुरा रहते थे। वहीं सज्जन कबूतरों का चौक और ओमशिवपुरी बाईजी का तालाब इलाके में रहते थे। महिपाल की नजराना और जय संतोषी मां, सज्जन का विक्रम और वेताल सीरियल में अदा किया वेताल का पात्र किसे याद नहीं है।
...तू बोला मैं चला.. हा हा हा.. टीवी सीरियल विक्रम और वेताल में विक्रम यानी अरुण गोविल के कंधे पर बैठा वेताल जब यह डायलॉग बोलता था तो बच्चे खूब खुश होते थे।

आेम शिवपुरी का किरदार और याद

इसके अलावा आेम शिवपुरी का अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म डॉन में निभाया गया किरदार लोगों को आज भी याद आता है। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर की ओर से हर साल ओम शिवपुरी स्मृति नाट्य समारोह का आयोजन
किया जाता है। जोधपुर के रंगकर्मी इन फनकारों को अपना आदर्श मानते हैं। यही वजह है कि अदाकारी की दुनिया से जुड़े जोधपुर शहर में उनके बाद भी अदाकारी का सिलिसिला कायम है।

रंगकर्म क्या है

रंगकर्म क्या है, रंगकर्म और फि ल्मी व टीवी की अदाकारी में क्या फर्क है। डायलॉग डिलीवरी का सही तरीका क्या है, इन सब बिंदुओं के साथ आइए हम रंगकर्म दिवस पर आइए आज बात करते हैं वरिष्ठ रंगकर्मी अरविंद भट्ट और लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष्ज्ञ रमेश बोराणा से। उनकी बात उन्हीं के शब्दों में :

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-एम आई जाहिर

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