scriptXloder hacked computer networks of 111 countries | 111 देशों के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर चुका ज्लोडर, भारत टॉप 3 में शामिल | Patrika News

111 देशों के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर चुका ज्लोडर, भारत टॉप 3 में शामिल

- मेलवेयर व रेनसमवेयर दोनों की तरह अटैक कर रहा है ज्लोडर
- माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम पर करता है अटैक
- रिमोट एक्सेस के जरिए करता है सिस्टम में प्रवेश
- बैंक और आइटी कम्पनियों की क्लाउड कम्प्यूटिंग का डाटा चुराने के बाद उनको एन्क्रीप्ट कर रहा वायरस

जोधपुर

Updated: January 13, 2022 03:20:23 pm

जोधपुर. कम्प्यूटर से वित्तीय जानकारी चुराने वाले हैकर्स ने इस बार ऐसा कम्प्यूटर वायरस/बेड सॉफ्टवेयर बनाया है जो मेलवेयर और रेनसमवेयर दोनों की तरह एक साथ अटैक कर रहा है। संभवत: यह पहला वायरस है जो कम्प्यूटर की वित्त सहित आवश्यक फाइलें चुराने के बाद उसको एन्क्रीप्ट कर देता है। इसका नाम ज्लोडर है जिसे हाल ही में ट्रेक किया गया है। ज्लोडर अब तक 111 देशों के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर चुका है। हैक होने वाले देशों में प्रथम स्थान पर अमरीका, दूसरे पर कनाड़ा और तीसरे पर भारत के कम्प्यूटर्स हैं। सर्वाधिक खतरा बैंकिंग सेक्टर्स और आइटी प्रोफेशनल्स को है जिनके सिस्टम आपस में नेटवर्र्किंग के जरिए जुड़े रहते हैं।
111 देशों के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर चुका ज्लोडर, भारत टॉप 3 में शामिल
111 देशों के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर चुका ज्लोडर, भारत टॉप 3 में शामिल
अभी तक मिली जानकारी के अनुसार यह माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही अटैक कर रहा है। विशेष बात यह है कि ज्लोडर सिस्टम की डिजिटल लिंक लाइबे्ररी में अपने कोड को इंस्टॉल करके माइक्रोसॉफ्ट का डिजिटल हस्ताक्षर इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में एंटी वायरस सॉफ्टवेयर भी इसको नहीं पहचान पाते। माइक्रोसॉफ्ट का असली डिजिटल हस्ताक्षर उपयोग में करने से खुद माइक्रोसॉफ्ट भी धोखा खा रहा है।
सिस्टम में कहां से आता है ज्लोडर
ज्लोडर को मेल्समोक हैकर्स ग्रुप ने 2015 में बनाया था। हैकर्स इसे तीन बार अपडेट कर चुके हैं। इसके बेड कोड ओपन नेटवर्क वेबसाइट टीमवर्क 455 डोट कॉम के सर्वर पर है। टीमवर्क 455 एक सेंडबॉक्स है जो गुड कोड के साथ बेड कोड की भी अनुमति देता है। सितम्बर 2021 में इसको मेलवेयर और रेनसमवेयर दोनों के रूप में उतारा गया है। यह रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर मसलन् एनी डेस्क, टीम व्यूवर्स, एनी मिरर और पायरेटेड सॉफ्टवेयर के जरिए नेटवर्र्किंग में घुस जाता है। बैंक और आइटी सेक्टर में रिमोट एक्सेस का अधिक उपयोग किया जाता है। ऐसे में वर्तमान में यही दोनों सेक्टर्स इसके निशाने पर है।
कैसे काम करता है
ज्लोडर नेटवर्र्किंग के जरिए सिस्टम में आने के बाद पहले मेलवेयर की तरह व्यवहार करता है यानी सिस्टम की सभी महत्वपूर्ण फाइलों और वित्तीय जानकारी चुरा लेता है। इंटरनेट से कनेक्ट होते ही ज्लोडर लगातार हैकर्स को फाइलें ट्रांसफर करता रहता है। जब सिस्टम में महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं रहता है तो यह रेनसमवेयर बन जाता है यानी फाइलों के एक्सटेंशन बदलकर पूरे सिस्टम को एन्क्रीप्ट कर देता है। इससे सिस्टम काम नहीं करता है तब फाइलों को डिक्रिप्ट करने के लिए हैकर्स पैसे मांगते हैं।
‘ज्लोडर से सर्वाधिक खतरा बैंकिंग और आइटी सेक्टर को है। अभी तक की जानकारी के अनुसार यह पहला बेड सॉफ्टवेयर है जो मेलवेयर और रेनसमवेयर दोनों की तरह सिस्टम पर हमला कर रहा है।’
प्रिया सांखला, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट

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