35 करोड़ में बनने थे 31 किमी सड़क, स्वीकृति के दस साल बाद भी सिर्फ सात किमी निर्माण

18 माह में ठेकेदार ने निर्माण कार्य पूरा कराने के लिए किया था करार

By: Bhupesh Tripathi

Published: 29 Feb 2020, 04:00 PM IST

कांकेर. भानुप्रतापपुर लोक निर्माण विभाग की मॉनिटरिंग में कोयलीबेड़ा से प्रतापपुर तक 35 करोड़ में 31 किमी सड़क निर्माण का कार्य 10 साल में सिर्फ सात किमी हो पाया है। विभागीय अधिकारियों की अनदेखी के शेष सड़क का निर्माण कार्य भी इसी रफ्तार से होता रहा तो यह निर्माण कार्य पूरा होने में अभी 40 साल से अधिक समय लग सकता है। लोक निर्माण विभाग के अधिकारी कभी ठेकेदार की कमी तो कभी माओवादियों का खौफ बताकर प्रशासन को सड़क निर्माण में हो रही देरी की झूठी जानकारी दे रहे हैं। क्षेत्र की जनता 10 साल से सड़क निर्माण कार्य पूरा होने का इंतजार कर रही है।

माओवादी प्रभावित क्षेत्र में विकास की रफ्तार को बढ़ाने के लिए शासन से करोड़ों की राशि स्वीकृत हो रही है। कोयलीबेड़ा से प्रतापपुर को जोडऩे के लिए डबल लेन की डामर सड़क निर्माण शासन से 2010 में स्वीकृति मिली थी। उक्त सड़क निर्माण के लिए भानुप्रतापपुर लोक निर्माण विभाग की ओर से निविदा भी कराया गया था। उक्त सड़क की मॉनिटरिंग लोक निर्माण विभाग को करनी थी। सड़क निर्माण के लिए 9 जून 2010 को ठेकेदार को 18 माह में निर्माण कार्य पूरा कराने के लिए वर्क आर्डर भी लोक निर्माण विभाग की ओर से जारी किया गया था।

ठेकेदार ने पांच साल में सड़क निर्माण का कार्य शुरू नहीं कराया तो लोक निर्माण विभाग के अफसरों ने मजबूरी में उक्त निविदा को रद्दा करा दिया। दूसरी निविदा में दूसरे ठेकेदार ने उक्त सड़क का निर्माण कार्य समय पर पूरा कराने के लिए करार किया था। पांच साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी उक्त ठेकेदार ने अभी तक मात्र 7 किमी तक सड़क का निर्माण कार्य पूरा करा पाया है। यानी जिस सड़क का निर्माण कार्य 2010 में मात्र 18 माह में पूरा कराने के लिए लोक निर्माण विभाग भानुप्रतापपुर के अफसरों ने ठेकेदार से करार किया था उक्त सड़क का निर्माण कार्य अभी तक सिर्फ 7 किमी कराया गया है। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा कि क्या ठेकेदार और अफसरों की मिलीभगत में सड़क निर्माण में सिर्फ महंगाई भत्ता के खेल में निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं कराया जा रहा है। ठेकेदार ने कोयलीबेड़ा से प्रतापपुर तक बनने वाली 31

किमी की सड़क पर महंगाई भक्ता ले रहा है।
सूत्रों की माने तो यह सड़क अब 70 करोड़ से अधिक की हो चुकी है। कहीं न कहीं इस सड़क निर्माण में ठेकेदार को उपकृत करने के लिए विभागीय अधिकारी ही खेल कर रहे हैं। सड़क निर्माण में जैसे -जैसे दरी होती जाएगी निर्माण कार्य की लागत राशि बढ़ती जाएगी, जो ठेकेदार को लाभ मिलेगा। आम जनता के पैसे से होने वाले विकास कार्यों में अफसरों की मिलीभगत से निर्माण कार्य में देरी का खेल चल रहा है। जबकि क्षेत्र की जनता 10 साल से कोयलीबेड़ा से प्रतापपुर तक सड़क निर्माण के लिए प्रतिक्षा कर रहे हैं। विभाग के आलाधिकारियों से लेकर ठेकेदार के कानों पर निर्माण कार्य पूरा कराने में जू तक नहीं रेंग रहे हैं।

10 साल में ठेकेदारों पर अफसरों ने क्यों नहीं की कार्रवाई, 80 फीसदी कार्य लटका
नियम के आधार पर वर्क आर्डर जारी होने के 6 माह में अगर ठेकेदार ने काम चालू नहीं किया तो उक्त निविदा को रद्द करने का प्रावधान था। ठेकेदार की आमनत राशि विभाग जब्त कर लेता है। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा कि 10 साल में अभी तक विभाग के आलाधिकारियों ने ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं किया। अभी तक सिर्फ 20 प्रतिशत सड़क का निर्माण कार्य कराया गया है। 80 प्रतिशत सड़क का निर्माण कार्य अधर में हैं। कहीं न कहीं सड़क निर्माण में निविदा के बाद मिलने वाले महंगाई भत्ता के खेल में ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई करने से लोक निर्माण विभाग के आलाधिकारी कन्नी काट रहे हैं। इस संबंध में लोक निर्माण विभाग के एसडीओ कमलेश साहू से जानकारी चाही गई तो उन्होंने फोन पर किसी भी जानकारी को देने से इनकार कर दिया।

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