नक्सल क्षेत्र में शिक्षकों की कमी से जूझ रहे छात्रों ने कहा- गुरुजी नहीं दे सकते तो बंद कर दें स्कूल

शिक्षक दिवस पर आज हम आपको नक्सल प्रभावित क्षेत्र के स्कूलों की तस्वीर दिखा रहे हैं।

By: Bhawna Chaudhary

Updated: 05 Sep 2019, 02:14 PM IST

कोयलीबेड़ा. शिक्षक दिवस पर आज हम आपको नक्सल प्रभावित क्षेत्र के स्कूलों की तस्वीर दिखा रहे हैं। कोयलीबेड़ मुख्यालय से करीब बीस किमी दूर मरदा खास में 48 बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ एक शिक्षक तैनात है। कक्षा 6वीं से 8वीं तक के बच्चों को अकेले पढ़ाता है। जबकि इस स्कूल में शिक्षा विभाग के गाइड लाइन के आधार पर चार शिक्षकों के साथ एक एचएम का होना अनिवार्य है। वैसे इस गांव में माध्यमिक स्कूल का संचालन 6 जुलाई 2013 से किया जा रहा है।

आज तक न तो एकल शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहा है। शासन-प्रशासन द्वारा दावा किया जा रहा कि शिक्षा के स्तर में सुधार हो रहा है। पर हकीकत माओवादी क्षेत्र में कुछ और ही बयां कर रही है। इसी तरह से अधिकांश स्कूल एकल शिक्षकों के भरोसे चल रहा है। कुछ स्कूलों में गुरुजी नहीं आते हैं। रसोइया और चपरासी ही बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं। मरदा खास के छात्रों ने कहा कि शिक्षा विभाग गुरुजी नहीं दे पा रहा तो स्कूल में बंद करा दें और पालकों ने कहा आज शिक्षक दिवस पर विरोध में स्कूल में ताला बंद करेंगे।

यहां पढ़ रहे 48 बच्चों की जिम्मेदारी एक मात्र शिक्षक मोहनलाल वर्मा को सौंप उन्हें सुपरमेन बना देना चाहती है। एक ही दिन में तीनों कक्षाओं के कुल 18 कालखंड होते है । आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि शिक्षक मोहनलाल कोई सुपरमेन ही होंगे जो इतने कालखण्डों को एक साथ वहन करते हैं। इस पर भी कभी डाक तो कभी शालेय रिपोर्ट की जिम्मेदारी अलग से पूरा करनी होती है। अगर कभी कोई ट्रेनिंग या अन्य कार्य से बाहर जाना पड़े तो स्कूली बच्चे ही शिक्षक के भूमिका में आ जाते हैं। आपसी सामंजस्य से दिनभर पढ़ाई कर भविष्य के सपना को गढ़ते हैं। ऐसा नहीं कि यहां के लोगों ने शिक्षकों की मांग के लिए आवेदन निवेदन नहीं किया है।

पालकों ने बताया कि बार-बार और हजार बार मांगों किया गया। शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए सभी जगह गुहार पहुंचाया पर किसी को गरीबों के बच्चों के भविष्य से कोई सरोकार नहीं लग रहा है। तभी तो एक मात्र शिक्षक के भरोसे 48 बच्चों का भविष्य थोप दिया गया है। शिक्षक मोहनलाल को कोई मलाल नहीं की अकेले हंै। पर उन्हें भी बच्चों के भविष्य की चिंता रहती है। समय पर कोर्स पूरा करना, परीक्षाएं लेना रिजल्ट बनाना और आगे की कक्षाओं के लिए बच्चों को तैयार करना काफी चुनौती पूर्ण कार्य है। जिसे वह निभा रहे हैं। पर कोई सहयोगी मिल जाता तो और भी बेहतर परिणाम की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन अबतक विभाग द्वारा इस पर कोई भी पहल न करना समझ से परे है।

शौचालय होने के बाद भी बच्चे जा रहे जंगल
वैसे वनांचल के इस स्कूल में बच्चों के लिए शौचालय तो बनाया गया पर झाडिय़ों में जाने को मजबूर हो रहे हैैं। स्कूल के शौचालय ऐसे बना दिया गया कि उपयोग के लायक ही नहीं है। स्कूल में न ही पंखा है न ही लाइट है। जिसके चलते बच्चों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यदि शिक्षक किसी दिन अनुपस्थिति होते हैं तो बच्चे ही एक दूसरे को पढ़ाते हैं। वर्ष 2013 से यहां शिक्षा का यही हाल है।

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