माया-अखिलेश की होली बदरंग, शिवपाल उड़ा रहे रंग

माया-अखिलेश की होली बदरंग, शिवपाल उड़ा रहे रंग
akhilesh yadav mayawati

Ruchi Sharma | Publish: Mar, 13 2017 10:23:00 AM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

उत्तर प्रदेश का यह पहला चुनाव था, जिसमें कई राजनेताओं का कॅरियर दांव पर लगा था। इसी के चतले नेताअों ने जमकर प्रचार किया

कानपुर. उत्तर प्रदेश का यह पहला चुनाव था, जिसमें कई राजनेताओं का कॅरियर दांव पर लगा था। इसी के चतले नेताअों ने जमकर प्रचार किया, वादे इरादे गिनाए और पीएम पर आरोप प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी। लेकिन पब्लिक ने इनकी बातों को नजरअंदाज कर भजपा के पक्ष में मतदान कर बुआ-बबुआ की होली फीकी कर दी। इसके विपरीत चाचा शिवपाल और भगवाधारी अपने समर्थकों के साथ रंग गुलाल उड़ा रहे हैं। सैफई में अखिलेश परिवार के साथ मौजूद हैं, लेकिन मुलायम सिंह इस साल फूलों की होली खेलने के लिए नहीं गए। सूत्रों की माने तो अखिलेश सैफई में बैठकर हार की वजहों पर मंथन कर रहे हैं। 

इसके चलते साइकिल हुई पंचर
 
यूपी चुनाव से पहले सपा घर की कलह से जूझ रही थी। नमांकन के महज 20 दिन पहले सीएम अखिलेश यादव को चुनाव आयोग के जरिए साइकिल सिंबल मिला। इसी के बाद उम्मीदवारों को टिकट देकर मैदान पर उतारा गया। कैंडीडेट्स को समय कम मिला, ऊपर से उन्हें भीतरघाट से भी दो चार होना पड़ा। जिसका परिणाम यह रहा कि सपा की साइकिल पंचर हो गई।  डीएबी कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह के मुताबिक अखिलेश यादव ने अपने संगठन के विरोध के बावजूद कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और परिणाम यह रहा कि पब्लिक ने उनकी साइकिल की हवा निकाल, होली फीकी कर दी। आज भी सपा में जितनी पकड़ शिवपाल की है उतनी अन्य सपाईयों के पास नहीं है। अगर शिवपाल यादव के साथ चुनाव सपा अकेले लड़ती तो परिणाम कुछ और दिखता। 

काम नहीं आई मायावती की तैयारी, हालत पतली

वहीं बसपा सुप्रीमो ने चुनाव की तैयारी एक साल पहले शुरू कर दी। अधिकतर सीटों पर उन्होंने प्रत्याशियों को टिकट देकर मैदान पर उतार दिया था, बावजूद हाथी कमाल नहीं कर सका। डीएबी कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह के मुताबिक मायावती अहम के चलते हारीं। जिन वोटरों के दम पर वह दो दशक से ज्यादा समय से यूपी में राज करती आ रही थीं, वह ज्यादा संख्या में भाजपा के साथ खड़ा हो गया। इसी के चलते हाथी कई जिलों में खाता तक नहीं खोल पाया। मायावती अपने  गढ़ों में चारों खाने चित हुई। बुंदेलों ने उन्हें यहां खाता खोलने तक इसबार मौका तक नहीं दिया।
  
...मायावती की फिर हालत की पतली 

2012 विधानसभा के चुनाव में कनपुर से बसपा ने खाता नहीं खोला और 2017 में फिर वही कहानी दोहराई गई। नगर, ग्रामीण और देहात की में सीटों पर हाथी चुनाव हार गया और सिर्फ दो सीटों पर दो नंबर पर रहा। जबकि ऐसे कई सीटें रहीं जहां बसपा 20 से 25 हजार वोट पा सकी। अनूप सिंह के मुताबिक मायावती ने  21  दलित तो 19 फीसदी मुस्लिम वोटर्स पर भरोसा जताया, लेकिन वह बसपा के बजाया भाजपा और सपा के पक्ष में चला गया।
 
प्रोफेसर और सिद्दिकी के चलते होली खराब 

प्रोफेसर अनूप सिंह के मुताबिक मायावती ने 2012 के चुनाव में नसिमुद्दीन के कहने पर 90 से ज्यादा सिंटिंग विधायकों के टिकट काट दिए। तब यह आरोप लगे थे कि पैसे लेकर टिकटों दिए गए। सभी विधायक बागी हो गए और बसपा के खिलाफ ही चुनाव में उतर गए और हाथी को हार उठानी पड़ी। 2017 के चुनाव में मायावती ने फिर सिद्दिकी पर भरोसा जताया और उनके चहेतों को टिकट दिया और कहानी सबके सामने है। यही हाल सपा के प्रोफेसर रामगोपाल ने किया। पहले पिता और चाचा से अखिलेश का बैर कराया और कांग्रेस के साथ गठबंधन करवाया। कार्यकर्ता और जनता इसे पचा नहीं पाई और बड़ी संख्या में यादव वोटर भी भाजपा के पक्ष में वोट कर गया। 

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