बीजेपी का गेम बिगाड़ने के लिए अखिलेश यादव ने खेला दांव, सपा के इन नेताओं को दी बड़ी जिम्मेदारी

Nitin Srivastava

Publish: Apr, 17 2018 12:45:20 PM (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
बीजेपी का गेम बिगाड़ने के लिए अखिलेश यादव ने खेला दांव, सपा के इन नेताओं को दी बड़ी जिम्मेदारी

4 फीसदी सुदामा तय करते हैं हार जीत, हाथी और शंख के साथ उतरेंगे अखिलेश...

कानपुर. लखनऊ से लेकर दिल्ली की सत्ता की चाफी आजादी के बाद से सुदामा (ब्राह्मण) मतदाताओं के हाथों में रही है। जिधर यह वर्ग घूमा वही दल कुर्सी पर बैठा। यूपी की सियासत में 14 फीसदी ब्राह्मण मतदाता अक्सर अहम रोल अदा करता आ रहा है। आजादी के बाद कई सालों तक यह वर्ग कांग्रेस के साथ मजबूती के साथ खड़ा रहा तो राममंदिर आंदोलन के बाद भाजपा की तरफ मुड़ गया। मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव को भी मौका दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में ब्राह्मणों को मोदी भा गए और चार साल से चारो तरफ कमल ही कमल खिल रहा है। इसी से निपटने के लिए समाजवादी पार्टी ने यूपी के सुदामा को खुश करने के लिए अंदरखाने लगे हुए हैं। पार्टी अपने बेड़े में तेज-तर्राक ब्राह्मण नेताओं की फौज तैयार कर रही है, जो गली, मोहल्लों और ब्राह्मण बाहूल्य इलाकों में जाकर सपा की विचारधारा से उन्हें अवगत कराएंगे।

 

सपा ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ रही

समाजवादी पार्टी प्रदेश कार्यालय के डॉक्टर लोहिया सभागार में बीते दिनों समाजवादी प्रबुद्ध सभा द्वारा ‘वर्तमान राजनीतिक दिशा और समाजवाद की आवश्यकता ‘विषय पर विचारगोष्ठी आयोजित की गई. इस गोष्ठी में मुख्य अतिथि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि प्रबुद्ध समाज ने हमेशा समाज और राजनीति को दिशा दी है। इस समाज ने हजारों वर्षों से रास्ता दिखाया हैं। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा का रिश्ता पुराना है। अब साइकिल-हाथी और शंख साथ-साथ रहेंगे। इसी के बाद सपा पदाधिकारी भाजपा के बेसवोट बैंक में सेंधमारी करने के लिए जुट गए हैं। जानकारों का कहना है कि हर विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण बाहूल्य बूथों पर ब्राह्मण पदाधिकारी की नियुक्ति की जाएगी। साथ ही सपा के बड़े नेता जल्द ही ब्राह्मणों के साथ चौपाल लगाएंगे और उनकी समस्याओं को सुनकर निपटाएंगे।

 

बसपा के पास सतीश चंद्र मिश्रा

सपा के पास मजबूत ब्राह्मण चेहरा नहीं हैं, लेकिन बसपा के पास सतीश चंद्र मिश्रा हैं। जिन्होंने 2007 विधानसभा चुनाव के वक्त ब्राह्मणों का इकतरफा वोट हाथी के पक्ष खड़ा कर दिया और कई सालों के बाद यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थीं। मायावती ने भी दलित, ब्राह्मण कार्ड खेला और 100 से ज्यादा टिकट ब्राह्मण कैंडीडेट्स को दिए। 2017 विधानसभा चुनाव ले लें या पिछले कुछ चुनाव इसका उदाहरण हैं कि ये जिसके भी साथ जाता है, सरकार उसकी बनती है। 2009 में यही ब्राह्मण कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गए और कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में जोरदार प्रदर्शन किया। राजनीतिक विश्लेषक अनूप सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण को डिसाइडिंग शिफ्टिंग वोट कहा जाता है। कारण ये है कि ब्राह्मण मतदाता को लेकर यहां कोई भी दल आज तक खुशफहमी नहीं पाल सका है कि ये वोट बैंक उसका है। खुद अटल बिहारी बाजपेयी ब्राह्मण नेता होने के बावजूद 2004 का चुनाव हार गए थे।

 

सोच-समझ कर करते हैं मतदान

प्रदेश में ब्राह्मण संख्या के लिहाज से दलित, मुस्लिम से कम माने जाते हैं. लेकिन फिर भी ये करीब-करीब 14 फीसदी हैं, जो कि कम नहीं है। वहीं उत्तर प्रदेश के मध्य और पूर्वांचल के करीब 29 जिलों में इनकी भूमिका अहम मानी जाती है। वहां ब्राह्मणों के पास जमींदारी रही है। इनका प्रभाव प्रदेश की कई ऐसी सीटों पर भी देखने को मिलता है। अनूप सिंह कहते हैं कि, उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण अभी भी समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करने में सफल होते हैं। ये सोच विचार कर वोट देने वाले होते हैं। जातिगत गणना पर नजर जरूर रखते हैं, लेकिन वोट ये जातीय आधार पर नहीं डालते। यह डिसाइडिंग शिफ्टिंग वोट है। अनूप सिंह बताते हैं कि 90 के दशक में ब्राह्मण समुदाय ने बीजेपी को काफी समर्थन दिया, लेकिन 2017 से पहले के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो बीजेपी का ब्राह्मण वोट सिकुड़ता गया। वर्ष 2002 में यह करीब 50 प्रतिशत था। 2007 में यह 44 प्रतिशत पर आ गया और 2012 में यह मात्र 38 प्रतिशत पर रह गया था। इन दोनों चुनावों में बसपा और सपा की सरकार बनीं। वहीं 2004 से लेकर 2013 तक ब्राह्मण वोर्टस केंद्र में कांग्रेस व उसकी सहयोगी दलों को वोट दिया।

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