अनुप्रिया के इस नेता ने प्रणव दा को बताया ग्रेट, विरोध करने वाले RSS की शाखा करें ज्वाइन

पूर्व राष्ट्रपति व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी के नागपुर संघ कार्यालय पहुंचने का राजनीतिक दलों के नेता कर रहे विरोध, उन्हें कुछ इस तरह से अजय प्रताप ने दिया जवाब

By: Vinod Nigam

Published: 07 Jun 2018, 11:21 AM IST

कानपुर। जो लोग संघ की विचारधारा को गलत बताते हैं हमारी उन्हें सलाह है कि वह शाखा ज्वाइन करें। तब उन्हें पता चलेगा कि संघ सोंच देश के लिए क्या है। संध एक देशभक्त संगठन है और 1962 से लेकर 1971 तक पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान अपना अहम योगदान दिया है। पुखरायां रेल हादसे के वक्त कांग्रेस, सपा, बसपा, लेफ्ट सहित कोई भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता आगे नहीं आए। संघ ने पुलिस-प्रशासन से कंधे से कंधा मिला रेस्क्यू ऑपरेशन में सहयोग कर दर्जनों लोगों की जान बचाई थीं। संघ के स्वयसेवकों ने खून से लेकर भोजन की व्यवस्था की थी। जब-जब देश में प्राकृतिक आपदा आती है, तब-तब संघ के स्वयंसेवक अपना घर-द्धार छोड़ कर लोगों की मदद के लिए आगे आते हैं। प्रणण मुखर्जी एक देशभक्त नेता हैं और उनके नागपुर जाने से लोगों को कुछ अच्छा सुनने को मिलेगा। देश में पाकिस्तानी विचारधारा अब नहीं चलेगी। यह बात अनुप्रिया पटेल की पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य अजय प्रताप सिंह ने ट्यूट के जरिए अपनी भावना व्यक्त की।
नागपुर पहुंचे प्रणव मुखर्जी, सियासत तेज
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आज आरएसएस मुख्यालय में आयोजित होने वाले ’संघ शिक्षा वर्ग’ के समापन समारोह में हिस्सा लेने के लिए नगापुर पहुंच चुके हैं। उनके नागपुर पहुंचने पर बड़ी संख्या में संघ कार्यकर्ता भी नागपुर एयरपोर्ट पहुंचे, जहां संघ के सह सर कार्यवाह वी. भगैय्या और नागपुर शहर इकाई के अध्यक्ष राजेश लोया ने फूलों का गुलस्ता देकर उनका स्वागत किया। इस कार्यक्रम के दौरान प्रणब मुखर्जी संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण कोर्स के समापन समारोह में भाषण देंगे। दरअसल, बतौर कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी ने हमेशा संघ की आलोचना की, लिहाजा संघ कार्यकर्ताओं और लोगों में इस बात को लेकर उत्सुकता है कि वह समारोह में अपने भाषण के दौरान क्या संदेश देंगे। वहीं कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने पूर्व राष्ट्रपति को नागपुर नहीं जाने की सलाह दी थी। कुछ ने खुलकर उनकी आलोचना की। जिस पर संघ को जानने वाले भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी भावना व्यक्त कर रहे हैं।
विरोध करने वाले मूर्ख
अनुप्रिया पटेल की पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य अजय प्रताप ने ट्यूट के जरिए लिखा कि आरएसएस के कार्यक्रम में प्रणव दा के जाने का जो लोग विरोध कर रहे हैं वह मूर्ख हैं। ऐसे लोगों की पूरजोर भर्त्सना करता हूं। आगे लिखते हैं मैं प्रणवदा का समर्थन करता हूं। किसी व्यक्ति अथवा संगठन को दूर से ही अछूत मान लेना टीक नहीं है। प्रणवदा का कदम रातनीति से ऊपर है और प्रसंशनीय है। अजय लिखते हैं कि इंदिरा गांधी के निधन के वक्त प्रणवदा पीएम की रेस में आगे थे, लेकिन परिवारवाद के चलते उनकी जगह राजीव गांधी को कुर्सी दी गई। जबकि संघ इसी का विरोध कई सालों से करता आ रहा है। राजनीतिक दलों में आज भी बड़े ओहदों पर एक ही परिवार को कब्जा है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।
लेफ्ट की विचारधारा देशविरोधी
अजय भी कई सालों तक संघ से जुड़े रहे हैं और आज भी वह शाखा ज्वाइन करते हैं। अजय ने कहा कि प्रणब दा के इस फैसले के विरोध ने भले ही लोगों को चौंकाया हो, लेकिन इसकी वजह जानने की कोशिश करेंगे, तो राजनीतिक दलों की कलई खुलती मिलेगी। इस दौरे के विरोध में जिन बुद्धिजीवियों का शोर सुनाई दे रहा है, वे उस विचारधारा से प्रेरित हैं, जो भारत के लिए विदेशी तो है ही, पूरी दुनिया में उसे नकारा भी जा चुका है। जबरदस्त असहिष्णुता और हिंसा के जरिये समानता के दावे करने वाली इस सोच को दुनिया वामपंथ कहती है। विचारों की सहमति’ का उनका सलीका उन्हें ये सब करने पर मजबूर करता है। ये तरीका अलग-अलग सोच वाले लोगों को साथ लेकर चलने के संस्कार से न केवल बिल्कुल अलग है बल्कि उसके एकदम उलट भी है। वो मानते हैं कि चूंकि आप उनकी विचारधारा के साथ नहीं है, इसलिए आप आलोचना के पात्र हैं, यही है वामपंथ की परंपरा। विडंबना ये कि असहिष्णुता के इस लगातार प्रदर्शन के बावजूद उनका दावा है कि वे मानवाधिकारों के सबसे बड़े वकील हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के महान समर्थक भी, पर वह ऐसे नहीं है।
विरोधियों की तुलना फुटकर नेताओं से की
अजय प्रताप कहते हैं, आज जब कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता पर, जो इस देश के राष्ट्रपति भी रहे हैं, कांग्रेस के छुटभैये नेताओं की तरफ से सवाल उठाए जा रहे हैं, इतिहास बरसों बाद खुद को दोहराता हुआ दिखाई दे रहा है। दुख की बात है कि इन फुटकर नेताओं में वे भी शामिल हैं जिनकी छवि तो बहुत खराब रही ही है, उनका राजनीतिक अनुभव प्रणब दा का आधा भी नहीं है। आखिर किसी स्वयंसेवक ने ये सवाल क्यों नहीं उठाया कि पूर्व राष्ट्रपति और एक वक्त के बड़े कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी को संघ के कार्यक्रम में क्यों बुलाया गया. यही फर्क है संघ और उन लोगों की की सोच में जो दावा करते हैं कि वे अभिव्यक्ति की आजादी के चैम्पियन हैं। भिन्न-भिन्न सोच वाले लोगों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करना भारतीय परंपरा रही है।इसका तिरस्कार या विरोध करना भारतीयता के खिलाफ तो है ही, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, उसकी संस्कृति और हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं पर चोट भी है।

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