कानपुर में खुला अस्थि कलश बैंक, दाह संस्कार के बाद यहां रखी जाती हैं अस्थियां

कानपुर में गंगा को प्रदूषण से बचाने की पहल, खुला अस्थि कलश बैंक...

By: Hariom Dwivedi

Updated: 04 Jan 2018, 01:50 PM IST

विनोद निगम
कानपुर. देश में अनेकों बैंक हैं, जहां ग्राहक अपने पैसे और जेवरात को जमा करते हैं। लेकिन कानपुर के भैरवघाट स्थित एक कलश अस्थि बैंक हैं, यहां लोग अपने पूर्वजों का दाह संस्कार करने के बाद उनकी अस्थियों को यहां रखते हैं। इस बैंक की स्थापना युग दधीचि देहदान संस्था के संस्थापक मनोज सेंगर ने की है। अस्थि बैंक स्थापना करने के पीछे इनके कई उद्देश्य हैं। बताते हैं कि अगर लावारिस शव का दाह संस्कार होने के बाद उसकी अस्थियों को लेने के लिए कोई नहीं आगे नहीं आया तो हमने उन्हें रखने और विर्जसन करने का बीड़ा उठाया। हमने खुद की कमाई से यहां अस्थि कलश बैंक खोला। पहले उन्हीं शवों की अस्थियां बैंक पर रखी जाती जिनका कोई वारिश नहीं होता। इसके बाद अन्य लोग भी बैंक को देखकर प्रभावित हुए और अपने पूर्वजों की अस्थियों को यहां जमा करने लगे। बैंक की देखरेख के लिए चार कर्मचारी हमने लगाए, जो अस्थि रखने वाले का पूरा ब्योरा रखते हैं। लोगों को अपने पूर्वजों की अस्थियां एक माह के अंदर ले जानी होती है। अगर तय तारीख पर लोग नहीं आते तो संस्था अस्थियों का भूमि-विर्सजन कर देती है।

मनोज सेंगर ने बताया कि हर रोज मैं भैरवघाट तट पर आकर गंगा स्नान के लिए आया करता था। इसी दौरान मेरी नजर कुत्तों पर पड़ी तो लावारिश शवों के दाह संस्कार के बाद अस्थियों पर अपना मुंह मार रहे थे। साथ ही अधजले शव लोग गंगा में प्रवाह करते हैं, जिसके चलते वह मैली होती। यह बात मेरे दिल को लग गई और मैंने इन्हें सहेज कर रखने की ठानी। हमने यहीं पर कलश अस्थि बैंक की अधारशिला रख दी।' उन्होंने बताया कि शुरुआत में तो सिर्फ उन्हीं अस्थियों को रखा जाता, जिनका कोई नहीं होता, पर धीरे-धीरे अन्य लोग भी अपने पूर्वजों की अस्थियां यहां जमा करवाने लगे। यहां अस्थि रखने वालों को बाकायदा एक कार्ड दिया जाता है, जिस पर नाम पता व लाकर नबर लिखा होता है। अपने पुरखों की अस्थियां रखने वाले लोग तय समय पर आकर बैंक से अस्थियां निकलवाते हैं और उन्हें पवित्र नदियों में विसर्जित करते हैं। अगर दिए गए समय पर लोग अस्थियां लेने नहीं आते तो कर्मचारी उनका भूमि विसर्जन कर देते हैं।

30 दिन का दिया जाता है वक्त
जब लोग शवदाह करते हैं तो राख अधजली लकड़ियां के साथ ही अधजले शवों को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं, जिससे गंगा मैली होती है। कई लोग ऐसे होते हैं जो अस्थियों को चुन तो जरूर लेते हैं लेकिन उनका तुरंत विसर्जन नहीं करते। ऐसे में वो अस्थियों को घर में नहीं रख पाते हैं और घर के बाहर संभाल के रखना संभव नहीं होत। मोक्षधाम घाट पर आने वाले लोगों को हमने विद्युत शवदाह गृह के लिए प्रेरित किया। तमाम लोग अब विद्युत शवदाह करने के बाद अस्थियों को बैंक में जमा कर रहे हैं। इसके बदले में संस्था द्वारा कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। मनोज सेंगर का कहना है कि हर माह करीब सौ से ज्यादा अस्थि कलश बैंक में जमा होते हैं।

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की पहल
मनोज ने बताया कि मृतक का नाम पता लिखकर एक कार्ड बनाकर उनके परिजनों को दिया जाता है। अगर 30 दिनों तक अस्थियों को बैंक से नहीं निकाला जाता है तो संस्था खुद ही अस्थियों का भू विसर्जन करती है। मनोज सेंगर का कहना है कि जल्दी ही शहर के अन्य घाटों पर इस तरह के अस्थि बैंक बनाये जायेंगे। दधीचि संस्था से जुड़े मदन लाल भाटिया का कहना है कि यह एक सराहनीय प्रयासा है। क्योंकि समाज में जो कुरीतियां फैली हैं उसको तोड़ने के लिये किसी न किसी को तो आगे आना ही पड़ेगा। बैंक में अस्थि रखने वाले लोगों को प्रेरित किया जाता है कि अस्थियों को गंगा में प्रवाहित ना करके उनका भू विसर्जन करें जिससे गंगा साफ़ और निर्मल रहे।

Hariom Dwivedi
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