इस डेरा में चलता है बांग्लादेशी कानून, इंदिरा गांधी ने किया था इन परिवारों पर उपकार

इस समुदाय में आज भी बांग्लादेशी कानून चलता है। वही रीति रिवाज और वही पहनावा लोग आज भी अपनाते हैं।

By: Arvind Kumar Verma

Published: 18 Aug 2019, 06:30 PM IST

Kanpur, Kanpur, Uttar Pradesh, India

अरविंद वर्मा

कानपुर देहात-न रहने को आशियाना और न ही खुद ठिकाना। रोजमर्रा की जिंदगी में मजदूरी करके कमाना और परिवार का गुजर बसर करना यही इनकी असल जिंदगी है। हम बात कर रहे हैं रसूलाबाद विकास खंड क्षेत्र के महेंद्र नगर भैसायां गांव की। यहां करीब दो हजार बांग्लादेशी लोग निवास करते हैं। फूंस की झोपड़ी और कच्चे मकानों में गुजारा कर रहे इन लोगों के इस समुदाय में आज भी बांग्लादेशी कानून चलता है। वही रीति रिवाज और वही पहनावा लोग आज भी अपनाते हैं। समाज से विरत होकर ये लोग अपने नियमो के अनुसार सामंजस्य बिठाए हुए हैं। हैरत ये है कि पूरा देश विकास के पथ पर है लेकिन महेंद्र नगर के ये वाशिंदे जहां के तहां खड़े हैं। आजादी के बाद से आज भी लोग कच्चे मकानों में डर डरकर रहते है। यहां के लोग 1 साल मिट्टी और फूस एकत्र करके अपना आशियाना बनाते हैं और हर साल बारिश के दौरान उनका आशियाना उजड़ जाता है। बीते वर्ष बारिश के साथ पूरा गांव तबाह हो गया था। सैकड़ों गांव से पलायन कर गए थे। जिसके चलते स्थानीय समाजसेवियों ने लोगों की मदद की थी। इस बार भी ग्रामीण दहशत में है कि अगर पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी बाढ़ आई तो वे क्या करेंगे। आज फिर उनके माथे पर चिंता के बादल मंडरा रहे हैं।

 

आखिर कौन हैं महेंद्र नगर के वाशिंदे

दरअसल रसूलाबाद के इस बंगाली डेरा (महेंद्र नगर) में करीब 2000 लोग गुजर बसर करते हैं। कुल 100 मकानों में महज आधा दर्जन मकान पक्के हैं। रोजाना मजदूरी करके ये परिवार जीवन गुजार रहे हैं। ये कौन हैं, कहां से आये। बताते चलें कि 15 अगस्त 1947 को जब बांग्लादेश का बंटवारा हुआ तो बंगाल भाषी ये बांग्लादेशी दो हिस्सों में बंट गए। एक पूर्वी पाकिस्तान में तो दूसरा पश्चिमी भारत की सरहद पर हो गया। अफरा तफरी के माहौल लोग इधर उधर भागने लगे। समय गुजरने लगा, लोग इधर उधर भटक रहे थे, बस आशियाने की तलाश में थे तब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कई परिवारों को यहां बसाया था। 7 पीढियां गुजर गई। ये लोग बढ़कर आज संख्या में 10 गुना हो गए और यहीं के वाशिंदा बन गए। हैरत की बात है कि वहां की त्रासदी के बाद गरीबी से जूझ रहे इन परिवारों को आज फिर एक त्रासदी से गुजरना पड़ रहा है।

 

किस तरह हुई थी त्रासदी की मार

मंजर ही कुछ अजीब था गांवों का, जहां जमीन दिखती ही नहीं बस चारो तरफ था तो सिर्फ पानी। घर की दहलीज पर भीगे कपड़ों में खड़े मासूम बच्चे पेट की आग से जल रहे थे लेकिन उनका दर्द सुनने वहां कोई विधायक, ग्राम प्रधान यहां तक कि जिले का कोई जिम्मेदार भी नहीं पहुंचा था। सारे चूल्हे ठंडे होकर बह गए थे। घर में रोटी का एक निवाला भी नही बचा था, जो मासूम खाकर भूंख मिटा सकते। घर छोड़कर परिषदीय स्कूल में जाकर अपनी अपनी जानें बचाई थीं। खैर रहनुमा बनकर आये रसूलाबाद के कुछ समाज सेवियों ने हाँथ बढ़ाये थे और आर्थिक सहयोग कर उन बाढ़ पीड़ितों के लिए भोजन की व्यवस्था कराई थी। सैकड़ो ग्रामीणों के लिए भंडारा शुरू किया गया था। कई दिनों से भूंखे पीड़ित एकाएक ऐसे टूट पड़े थे। बाढ़ के कहर के बाद भूंख मिटने पर मानो नई जिंदगी मिल गयी हो। आज भी वो मंजर याद करके उनकी रूह सिहर उठती है।

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